महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइच्छेयं त्वत्प्रसादाद्धि तपस्तप्तुं प्रजेश्वर । प्रदिशेमं वरं देव त्वं मह्यं भगवन् प्रभो ॥ ७ ॥ प्रजेश्वर! मैं आपकी कृपासे तपस्या करना चाहती हूँ। देव! भगवन्! प्रभो! आप मुझे यही वर प्रदान करें ॥ ७ ॥
त्वया ह्युक्ता गमिष्यामि धेनुकाश्रममुत्तमम् । तत्र तप्स्ये तपस्तीव्रं तवैवाराधने रता ॥ ८ ॥ आपकी आज्ञा लेकर मैं उत्तम धेनुकाश्रमको चली जाऊँगी और वहाँ आपकी ही आराधनामें तत्पर रहकर कठोर तपस्या करूँगी ॥ ८ ॥
न हि शक्ष्यामि देवेश प्राणाम् प्राणभृतां प्रियान् । हर्तुं विलपमानानामधर्मादभिरक्ष माम् ॥ ९ ॥ देवेश्वर! मैं रोते-बिलखते प्राणियोंके प्यारे प्राणोंका अपहरण नहीं कर सकूँगी, आप इस अधर्मसे मुझे बचावें ॥ ९ ॥
ब्रह्मोवाच
मृत्यो संकल्पितासि त्वं प्रजासंहारहेतुना । गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा ते विचारणा ॥ १० ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**मृत्यो! प्रजाके संहारके लिये ही मेरे द्वारा संकल्पपूर्वक तेरी सृष्टि की गयी है। जा, तू सारी प्रजाका संहार कर। तेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ॥ १० ॥
भविता त्वेतदेवं हि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । भव त्वनिन्दिता लोके कुरुष्व वचनं मम ॥ ११ ॥ यह बात इसी प्रकार होनेवाली है। इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। तू लोकमें निन्दित न हो, मेरी आज्ञाका पालन कर ॥ ११ ॥
नारद उवाच
एवमुक्ताभवत् प्रीता प्राञ्जलिर्भगवन्मुखी । संहारे नाकरोद् बुद्धिं प्रजानां हितकाम्यया ॥ १२ ॥ **नारदजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर उन्हींकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े खड़ी हुई वह नारी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई; परंतु उसने प्रजाके हितकी कामनासे संहार-कार्यमें मन नहीं लगाया ॥ १२ ॥
तूष्णीमासीत् तदा देवः प्रजानामीश्वरेश्वरः । प्रसादं चागमत् क्षिप्रमात्मनैव प्रजापतिः ॥ १३ ॥ तब प्रजेश्वरोंके भी स्वामी भगवान् ब्रह्मा चुप हो गये। फिर वे भगवान् प्रजापति तुरंत अपने-आप ही प्रसन्नताको प्राप्त हुए ॥ १३ ॥