भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 392

स्मयमानश्च देवेशो लोकान् सर्वानवेक्ष्य च । लोकास्त्वासन् यथापूर्वं दृष्टास्तेनापमन्युना ॥ १४ ॥ देवेश्वर ब्रह्मा सम्पूर्ण लोकोंकी ओर देखकर मुसकराये। उन्होंने क्रोधशून्य होकर देखा, इसलिये वे सभी लोक पहलेके समान हरे-भरे हो गये ॥ १४ ॥ निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते । सा कन्यापि जगामाथ समीपात् तस्य धीमतः ॥ १५ ॥ उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उन परम बुद्धिमान् देवेश्वरके निकटसे अन्यत्र चली गयी ॥ १५ ॥ अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा । त्वरमाणा च राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची ॥ १६ ॥ सा तत्र परमं तीव्रं चचार व्रतमुत्तमम् । सा तदा ह्येकपादेन तस्थौ पद्मानि षोडश ॥ १७ ॥ पञ्च चाब्दानि कारुण्यात् प्रजानां तु हितैषिणी । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रियेभ्यः संनिवर्त्य सा ॥ १८ ॥ उसने वहाँ अत्यन्त कठोर और उत्तम व्रतका पालन आरम्भ किया। उस समय वह दयावश प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे अपनी इन्द्रियोंको प्रिय विषयोंसे हटाकर इक्कीस पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही ॥ १७-१८ ॥ ततस्त्वेकेन पादेन पुनरन्यानि सप्त वै । तस्थौ पद्मानि षट् चैव सप्त चैकं च पार्थिव ॥ १९ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर पुनः अन्य इक्कीस पद्म वर्षोंतक वह एक पैरसे खड़ी होकर तपस्या करती रही ॥ १९ ॥ ततः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा । पुनर्गत्वा ततो नन्दां पुण्यां शीतामलोदकाम् ॥ २० ॥ अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च सानयत् । तात! इसके बाद दस हजार पद्म वर्षोंतक वह मृगोंके साथ विचरती रही, फिर शीतल एवं निर्मल जलवाली पुण्यमयी नन्दानदीमें जाकर उसके जलमें उसने आठ हजार वर्ष व्यतीत किये ॥ २० १/२ ॥ धारयित्वा तु नियमं नन्दायां वीतकल्मषा ॥ २१ ॥ सा पूर्वं कौशिकीं पुण्यां जगाम नियमैधिता । तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः ॥ २२ ॥