महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'देव! प्रभो! सर्वेश्वर! मैं आपसे यही वर पाना चाहती हूँ कि मुझे रोती-चिल्लाती हुई स्वस्थ प्रजाओंका वध न करना पड़े ।। ३० ।। अधर्मभयभीतास्मि ततोऽहं तप आस्थिता । भीतायास्तु महाभाग प्रयच्छाभयमव्यय ।। ३१ ।। 'महाभाग! मैं अधर्मके भयसे बहुत डरती हूँ, इसलिये तपस्यामें लगी हुई हूँ। अविनाशी परमेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको अभय-दान दीजिये ।। ३१ ।। आर्ता चानागसी नारी याचामि भव मे गतिः । तामब्रवीत् ततो देवो भूतभव्यभविष्यवित् ।। ३२ ।। 'नाथ! मैं एक निरपराध नारी हूँ और आपके सामने आर्तभावसे याचना करती हूँ, आप मेरे आश्रयदाता हों।' तब भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता भगवान् ब्रह्माने उससे कहा — ।। ३२ ।। अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संहरन्त्या इमाः प्रजाः । मया चोक्तं मृषा भद्रे भविता न कथंचन ।। ३३ ।। 'मृत्यो! इन प्रजाओंका संहार करनेसे तुझे अधर्म नहीं होगा। भद्रे! मेरी कही हुई बात किसी प्रकार झूठी नहीं हो सकती ।। ३३ ।। तस्मात् संहर कल्याणि प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः । धर्मः सनातनश्च त्वां सर्वथा पावयिष्यति ।। ३४ ।। 'इसलिये कल्याणि! तू चार श्रेणियोंमें विभाजित समस्त प्राणियोंका संहार कर। सनातनधर्म तुझे सब प्रकारसे पवित्र बनाये रखेगा ।। ३४ ।। लोकपालो यमश्चैव सहाया व्याधयश्च ते । अहं च विबुधाश्चैव पुनर्दास्याम ते वरम् ।। ३५ ।। यथा त्वमेनसा मुक्ता विरजाः ख्यातिमेष्यसि । 'लोकपाल, यम तथा नाना प्रकारकी व्याधियाँ तेरी सहायता करेंगी। मैं और सम्पूर्ण देवता तुझे पुनः वरदान देंगे, जिससे तू पापमुक्त हो अपने निर्मल स्वरूपसे विख्यात होगी' ।। ३५ १/२ ।। सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरिदं विभुम् ।। ३६ ।। पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं प्रसाद्य शिरसा तदा । महाराज! उनके ऐसा कहनेपर मृत्यु हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रसन्न करके उस समय पुनः यह वचन बोली— ।। ३६ १/२ ।। यद्येवमेतत् कर्तव्यं मया न स्याद् विना प्रभो ।। ३७ ।। तवाज्ञा मूर्ध्नि मे न्यस्ता यत् ते वक्ष्यामि तच्छृणु ।