महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 395, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'प्रभो! यदि इस प्रकार यह कार्य मेरे बिना नहीं हो सकता तो आपकी आज्ञा मैंने शिरोधार्य कर ली है, परंतु इसके विषयमें मैं आपसे जो कुछ कहती हूँ, उसे (ध्यान देकर) सुनिये ।। ३७ १/२ ।। लोभः क्रोधोऽभ्यसूयेर्ष्या द्रोहो मोहश्च देहिनाम् ।। ३८ ।। अह्रीश्चान्योन्यपरुषा देहं भिन्द्युः पृथग्विधाः। 'लोभ, क्रोध, असूया, ईर्ष्या, द्रोह, मोह, निर्लज्जता और एक-दूसरेके प्रति कही हुई कठोर वाणी—ये विभिन्न दोष ही देहधारियोंकी देहका भेदन करें' ।। ३८ १/२ ।।
ब्रह्मोवाच
तथा भविष्यते मृत्यो साधु संहर भोः प्रजाः। अधर्मस्ते न भविता नापध्यास्याम्यहं शुभे ।। ३९ ।। ब्रह्माजीने कहा— मृत्यो! ऐसा ही होगा। तू उत्तम रीतिसे प्राणियोंका संहार कर। शुभे! इससे तुझे पाप नहीं लगेगा और मैं भी तेरा अनिष्ट-चिन्तन नहीं करूँगा ।। ३९ ।। यान्यश्रुबिन्दूनि करे ममासं- स्ते व्याधयः प्राणिनामात्मजाताः। ते मारयिष्यन्ति नरान् गतासून् नाधर्मस्ते भविता मा स्म भैषीः ।। ४० ।। तेरे आँसुओंकी बूँदें, जिन्हें मैंने हाथमें ले लिया था, प्राणियोंके अपने ही शरीरोंसे उत्पन्न हुई व्याधियाँ बनकर गतायु प्राणियोंका नाश करेंगी। तुझे अधर्मकी प्राप्ति नहीं होगी; इसलिये तू भय न कर ।। ४० ।। नाधर्मस्ते भविता प्राणिनां वै त्वं वै धर्मस्त्वं हि धर्मस्य चेशा। धर्म्या भूत्वा धर्मनित्या धरित्री तस्मात् प्राणान् सर्वथेमान् नियच्छ ।। ४१ ।। निश्चय ही, तुझे पाप नहीं लगेगा। तू प्राणियोंका धर्म और उस धर्मकी स्वामिनी होगी। अतः सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और धर्मानुकूल जीवन बितानेवाली धरित्री होकर इन समस्त जीवोंके प्राणोंका नियन्त्रण कर ।। ४१ ।। सर्वेषां वै प्राणिनां कामरोषौ संत्यज्य त्वं संहरस्वेह जीवान्। एवं धर्मस्त्वां भविष्यत्यनन्तो मिथ्यावृत्तान् मारयिष्यत्यधर्मः ।। ४२ ।। काम और क्रोधका परित्याग करके इस जगत्के समस्त प्राणियोंके प्राणोंका संहार कर। ऐसा करनेसे तुझे अक्षय धर्मकी प्राप्ति होगी। मिथ्याचारी पुरुषोंको तो उनका अधर्म