महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 401, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिवच्चार्चितौ तेन प्रीतौ तत्रोषतुः सुखम् ॥ ६ ॥
एक दिन वे दोनों महर्षि सृंजयसे मिलनेके लिये उसके घर पधारे। उसने विधिपूर्वक उनकी पूजा की और वे दोनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ६ ॥
तं कदाचित् सुखासीनं ताभ्यां सह शुचिस्मिता ।
दुहिताभ्यागमत् कन्या सृञ्जयं वरवर्णिनी ॥ ७ ॥
एक समय उन दोनों ऋषियोंके साथ राजा सृंजय सुखपूर्वक बैठे थे। उसी समय पवित्र मुसकानवाली परम सुन्दरी सृंजयकी कुमारी पुत्री वहाँ आयी ॥ ७ ॥
तयाभिवादितः कन्यामभ्यनन्दद् यथाविधि ।
तत्सलिङ्गाभिराशीर्भिरिष्टाभिरभितः स्थिताम् ॥ ८ ॥
आकर उसने राजाको प्रणाम किया। राजाने उसके अनुरूप अभीष्ट आशीर्वाद देकर अपने पार्श्वभागमें खड़ी हुई उस कन्याका विधिपूर्वक अभिनन्दन किया ॥ ८ ॥
तां निरीक्ष्याब्रवीद् वाक्यं पर्वतः प्रहसन्निव ।
कस्येयं चञ्चलापाङ्गी सर्वलक्षणसम्मता ॥ ९ ॥
तब महर्षि पर्वतने उस कन्याकी ओर देखकर हँसते हुए-से कहा—'राजन्! यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित चंचल कटाक्षवाली कन्या किसकी पुत्री है? ॥ ९ ॥
उताहो भाः स्विदर्क्स्य ज्वलनस्य शिखा त्वियम् ।
श्रीर्हीः कीर्तिर्धृतिः पुष्टिः सिद्धिश्चन्द्रमसः प्रभा ॥ १० ॥
'अहो! यह सूर्यकी प्रभा है या अग्निदेवकी शिखा अथवा श्री, ह्री, कीर्ति, धृति, पुष्टि, सिद्धि या चन्द्रमाकी प्रभा है?' ॥ १० ॥
एवं ब्रुवाणं देवर्षिं नृपतिः सृञ्जयोऽब्रवीत् ।
ममेयं भगवन् कन्या मत्तो वरमभीप्सति ॥ ११ ॥
इस प्रकार पूछते हुए देवर्षि पर्वतसे राजा सृंजयने कहा—'भगवन्! यह मेरी कन्या है, जो मुझसे वर प्राप्त करना चाहती है' ॥ ११ ॥
नारदस्त्वब्रवीदेनं देहि मह्यमिमां नृप ।
भार्यार्थं सुमहच्छ्रेयः प्राप्तुं चेदिच्छसे नृप ॥ १२ ॥
इसी समय नारदजी राजासे बोले—'नरेश्वर! यदि तुम परम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो अपनी इस कन्याको धर्मपत्नी बनानेके लिये मुझे दे दो' ॥ १२ ॥
ददानीत्येव संहृष्टः सृञ्जयः प्राह नारदम् ।
पर्वतस्तु सुसंक्रुद्धो नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
तब सृंजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर नारदजीसे कहा—'दे दूँगा'। यह सुनकर पर्वत अत्यन्त कुपित हो नारदजीसे बोले— ॥ १३ ॥
हृदयेन मया पूर्वं वृतां वै वृतवानसि ।
यस्माद् वृता त्वया विप्र मा गाः स्वर्गं यथेप्सया ॥ १४ ॥