महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'ब्रह्मन्! मैंने मन-ही-मन पहले ही जिसका वरण कर लिया था, उसीका तुमने वरण किया है। अतः तुमने मेरी मनोनीत पत्नीको वर लिया है, इसलिये अब तुम इच्छानुसार स्वर्गमें नहीं जा सकते' ।। १४ ।।
एवमुक्तो नारदस्तं प्रत्युवाचोत्तरं वचः । मनोवाग्बुद्धिसम्भाषा दत्ता चोदकपूर्वकम् ।। १५ ।। पाणिग्रहणमन्त्राश्च प्रथितं वरलक्षणम् । न त्वेषा निश्चिता निष्ठा निष्ठा सप्तपदी स्मृता ।। १६ ।।
उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने उन्हें यह उत्तर दिया—'मनसे संकल्प करके, वाणीद्वारा प्रतिज्ञा करके, बुद्धिके द्वारा पूर्ण निश्चयके साथ, परस्पर सम्भाषणपूर्वक तथा संकल्पका जल हाथमें लेकर जो कन्यादान किया जाता है, वरके द्वारा जो कन्याका पाणिग्रहण होता है और वैदिक मन्त्रके पाठ किये जाते हैं, यही विधि-विधान कन्या-परिग्रहके साधकरूपसे प्रसिद्ध है; परंतु इतनेसे ही पाणिग्रहणकी पूर्णताका निश्चय नहीं होता है। उसकी पूर्ण निष्ठा तो सप्तपदी ही मानी गयी है ।। १५-१६ ।।
अनुत्पन्ने च कार्यार्थे मां त्वं व्याहृतवानसि । तस्मात् त्वमपि न स्वर्गं गमिष्यसि मया विना ।। १७ ।।
'अतः इस कन्याके ऊपर पतिरूपसे तुम्हारा अधिकार नहीं हुआ है—ऐसी अवस्थामें भी तुमने मुझे शाप दे दिया है, इसलिये तुम भी मेरे बिना स्वर्ग नहीं जा सकोगे' ।। १७ ।।
अन्योन्यमेवं शप्त्वा वै तस्थतुस्तत्र तौ तदा । अथ सोऽपि नृपो विप्रान् पानाच्छादनभोजनैः ।। १८ ।। पुत्रकामः परं शक्त्या यत्नाच्चोपाचरच्छुचिः ।
इस प्रकार एक-दूसरेको शाप देकर वे दोनों उस समय वहीं ठहर गये। इधर राजा सृञ्जयने पुत्रकी इच्छासे पवित्र हो पूरी शक्ति लगाकर बड़े यत्नसे भोजन, पीनेयोग्य पदार्थ तथा वस्त्र आदि देकर ब्राह्मणोंकी आराधना की ।। १८ १/२ ।।
तस्य प्रसन्ना विप्रेन्द्राः कदाचित् पुत्रमीप्सवः ।। १९ ।। तपःस्वाध्यायनिरता वेदवेदाङ्गपारगाः । सहिता नारदं प्राहुर्देह्यस्मै पुत्रमीप्सितम् ।। २० ।।
एक दिन राजापर प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र देनेकी इच्छावाले सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण, जो तपस्या और स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाले तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे, एक साथ नारदजीसे बोले—'देवर्षे! आप इन राजा सृञ्जयको अभीष्ट पुत्र प्रदान कीजिये' ।। १९-२० ।।
तथेत्युक्त्वा द्विजैरुक्तः सृञ्जयं नारदोऽब्रवीत् । तुभ्यं प्रसन्ना राजर्षे पुत्रमीप्सन्ति ब्राह्मणाः ।। २१ ।।