भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर नारदजीने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। फिर वे सृंजयसे इस प्रकार बोले—'राजर्षे! ये ब्राह्मणलोग प्रसन्न होकर तुम्हारे लिये अभीष्ट पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं ।। २१ ।। वरं वृणीष्व भद्रं ते यादृशं पुत्रमीप्सितम् । तथोक्तः प्राञ्जली राजा पुत्रं वव्रे गुणान्वितम् ।। २२ ।। यशस्विनं कीर्तिमन्तं तेजस्विनमरिंदमम् । यस्य मूत्रं पुरीषं च क्लेदः स्वेदश्च काञ्चनम् ।। २३ ।। (सर्वं भवेत् प्रसादाद् वै तादृशं तनयं वृणे । 'तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें जैसा पुत्र अभीष्ट हो, उसके लिये वर माँगो'। नारदजीके ऐसा कहनेपर राजाने हाथ जोड़कर उनसे एक सद्गुणसम्पन्न, यशस्वी, कीर्तिमान्, तेजस्वी तथा शत्रुदमन पुत्र माँगा। वह बोला—'मुने! मैं ऐसे पुत्रकी याचना करता हूँ, जिसका मल, मूत्र, थूक और पसीना सब कुछ आपके कृपाप्रसादसे सुवर्णमय हो जाय' ।। २२-२३ १/२ ।।

व्यास उवाच

तथा भविष्यतीत्युक्ते जज्ञे तस्येप्सितः सुतः ।। काञ्चनस्याकरः श्रीमान् प्रसादाच्च सुकाङ्क्षितः । अपतत् तस्य नेत्राभ्यां रुदतस्तस्य नेत्रजम् ।।) सुवर्णष्ठीविरित्येवं तस्य नामाभवत् कृतम् । तस्मिन् वरप्रदानेन वर्धयत्यमितं धनम् ।। २४ ।। **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! तब मुनिने कहा—'ऐसा ही होगा'। उनके ऐसा कहनेपर राजाको मनोवांछित पुत्र प्राप्त हुआ। मुनिके प्रसादसे वह शोभाशाली पुत्र सुवर्णकी खान निकला। राजा वैसा ही पुत्र चाहते थे। रोते समय उसके नेत्रोंसे सुवर्णमय आँसू गिरता था। इसीलिये उस पुत्रका नाम सुवर्णष्ठीवी प्रसिद्ध हो गया। वरदानके प्रभावसे वह अनन्त धनराशिकी वृद्धि करने लगा ।। २४ ।। कारयामास नृपतिः सौवर्णं सर्वमीप्सितम् । गृहप्राकारदुर्गाणि ब्राह्मणावसथान्यपि ।। २५ ।। शय्यासनानि यानानि स्थाली पिठरभाजनम् । तस्य राज्ञोऽपि यद् वेश्म बाह्याश्चोपस्कराश्च ये ।। २६ ।। सर्वं तत् काञ्चनमयं कालेन परिवर्धितम् । राजाने घर, परकोटे, दुर्ग एवं ब्राह्मणोंके निवासस्थान सारी अभीष्ट वस्तुएँ सोनेकी बनवा लीं। शय्या, आसन, सवारी, बटलोई, थाली, अन्य बर्तन, उस राजाका महल तथा बाह्य उपकरण—ये सब कुछ सुवर्णमय बन गये थे, जो समयके अनुसार बढ़ रहे थे ।। २५-२६ १/२ ।।