महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुत्रशोकसे पीड़ित हुए राजा सृंजय विलाप कर रहे हैं—यह सुनकर देवर्षि नारद उनके समीप दिखायी दिये।।
उवाच चैनं दुःखार्तं विलपन्तमचेतसम् ।। ३५ ।।
सृञ्जयं नारदोऽभ्येत्य तन्निबोध युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिर! दुःखसे पीड़ित हो अचेत होकर विलाप करते हुए राजा सृंजयके निकट आकर नारदजीने जो कुछ कहा था, वह सुनो ।। ३५ १/२ ।।
(नारद उवाच)
त्यज शोकं महाराज वैक्लव्यं त्यज बुद्धिमन् ।
न मृतः शोचतो जीवेन्मुह्यतो वा जनाधिप ।।
**नारदजी बोले—**महाराज! शोकका त्याग करो! बुद्धिमान् नरेश! व्याकुलता छोड़ो! जनेश्वर! कोई कितना ही शोक क्यों न करे या दुःखसे मूर्च्छित क्यों न हो जाय, इससे मरा हुआ मनुष्य जीवित नहीं हो सकता।
त्यज मोहं नृपश्रेष्ठ न हि मुह्यन्ति त्वद्विधाः ।
धीरो भव महाराज ज्ञानवृद्धोऽसि मे मतः ॥)
नृपश्रेष्ठ! मोह त्याग दो! तुम्हारे-जैसे पुरुष मोहित नहीं होते हैं। महाराज! धैर्य धारण करो! मैं तुम्हें ज्ञानमें बढ़ा-चढ़ा मानता हूँ।
कामानामतृप्तस्त्वं सृञ्जयेह मरिष्यसि ।। ३६ ।।
यस्य चैते वयं गेहे उषिता ब्रह्मवादिनः ।
सृंजय! जिसके घरमें ये हम-जैसे ब्रह्मवादी मुनि निवास करते हैं, वह तुम भी यहाँ एक दिन भोगोंसे अतृप्त रहकर ही मर जाओगे ।। ३६ १/२ ।।
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।। ३७ ।।
संवर्तो याजयामास स्पर्धया वै बृहस्पतेः ।
यस्मै राजर्षये प्रादाद् धनं स भगवान् प्रभुः ।। ३८ ।।
हैमं हिमवतः पादं यियक्षोर्विविधैः स वै ।
यस्य सेन्द्राऽमरगणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।। ३९ ।।
देवा विश्वसृजः सर्वे यजनान्ते समासत ।
यज्ञवाटस्य सौवर्णाः सर्वे चासन् परिच्छदाः ।। ४० ।।
यस्य सर्वं तदा ह्यन्नं मनोऽभिप्रायगं शुचि ।
कामतो बुभुजुर्विप्राः सर्वे चान्नार्थिनो द्विजाः ।। ४१ ।।
पयो दधि घृतं क्षौद्रं भक्ष्यं भोज्यं च शोभनम् ।
यस्य यज्ञेषु सर्वेषु वासांस्याभरणानि च ।। ४२ ।।
ईप्सितान्युपतिष्ठन्ते प्रहृष्टान् वेदपारगान् ।