महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः
कर्णकी रणयात्रा
संजय उवाच
हतं भीष्ममथाधिरथिर्विदित्वा
भिन्नां नावमिवात्यगाधे कुरूणाम् ।
सोदर्यवद् व्यसनात् सूतपुत्रः
संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! अधिरथनन्दन सूतपुत्र कर्ण यह जानकर कि भीष्मजीके मारे जानेपर कौरवोंकी सेना अगाध महासागरमें टूटी हुई नौकाके समान संकटमें पड़ गयी है, सगे भाईके समान आपके पुत्रकी सेनाको संकटसे उबारनेके लिये चला ॥ १ ॥
श्रुत्वा तु कर्णः पुरुषेन्द्रमच्युतं
निपातितं शान्तनवं महारथम् ।
अथोपयायात् सहसारिकर्षणो
धनुर्धराणां प्रवरस्तदा नृप ॥ २ ॥
राजन्! तत्पश्चात् योद्धाओंके मुखसे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पुरुषप्रवर शान्तनुनन्दन महारथी भीष्मके मारे जानेका विस्तृत वृत्तान्त सुनकर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुसूदन कर्ण सहसा दुर्योधनके समीप चल दिया ॥ २ ॥
हते तु भीष्मे रथसत्तमे परै-
र्निमज्जतीं नावमिवार्णवे कुरून् ।
पितेव पुत्रांस्त्वरितोऽभ्ययात् ततः
संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ ३ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मके शत्रुओंद्वारा मारे जानेपर, जैसे पिता अपने पुत्रोंको संकटसे बचानेके लिये जाता हो, उसी प्रकार सूतपुत्र कर्ण डूबती हुई नौकाके समान आपके पुत्रकी सेनाको संकटसे उबारनेके लिये बड़ी उतावलीके साथ दुर्योधनके निकट आ पहुँचा ॥ ३ ॥
(सम्मृज्य दिव्यं धनुरारातज्यं
स रामदत्तं रिपुसंघहन्ता ।
बाणांश्च कालानलवायुकल्पा-
नुल्लालयन् वाक्यमिदं बभाषे ॥)
शत्रुसमूहका विनाश करनेवाले कर्णने परशुरामजीके दिये हुए दिव्य धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा ली और उसपर हाथ फेरकर कालाग्नि तथा वायुके समान शक्तिशाली बाणोंको ऊपर उठाते हुए इस प्रकार कहा।