भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

कर्ण उवाच

यस्मिन् धृतिर्बुद्धिपराक्रमौजः सत्यं स्मृतिर्वीरगुणाश्च सर्वे । अस्त्राणि दिव्यान्यथ संनतिर्ह्रीः प्रिया च वागनसूया च भीष्मे ॥ ४ ॥ सदा कृतज्ञे द्विजशत्रुघातके सनातनं चन्द्रमसीव लक्ष्म । स चेत् प्रशान्तः परवीरहन्ता मन्ये हतानेव च सर्ववीरान् ॥ ५ ॥

कर्ण बोला— ब्राह्मणोंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले तथा अपने ऊपर किये हुए उपकारोंका आभार माननेवाले जिन वीरशिरोमणि भीष्मजीमें चन्द्रमामें सदा सुशोभित होनेवाले शशचिह्नके समान सदा धृति, बुद्धि, पराक्रम, ओज, सत्य, स्मृति, विनय, लज्जा, प्रिय वाणी तथा अनसूया (दोषदृष्टिका अभाव)—ये सभी वीरोचित गुण तथा दिव्यास्त्र शोभा पाते थे, वे शत्रुवीरोंके हन्ता देवव्रत यदि सदाके लिये शान्त हो गये तो मैं सम्पूर्ण वीरोंको मारा गया ही मानता हूँ ॥ ४-५ ॥

नेह ध्रुवं किंचन जातु विद्यते लोके ह्यस्मिन् कर्मणोऽनित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीतार्यमहाव्रते हते ॥ ६ ॥

निश्चय ही इस संसारमें कर्मोंके अनित्य सम्बन्धसे कभी कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती है। श्रेष्ठ एवं महान् व्रतधारी भीष्मजीके मारे जानेपर कौन संशयरहित होकर कह सकता है कि कल सूर्योदय होगा ही (अर्थात् जीवन अनित्य होनेके कारण हममेंसे कौन कलका सूर्योदय देख सकेगा, यह कहना कठिन है। जब मृत्युंजयी भीष्मजी भी मारे गये, तब हमारे जीवनकी क्या आशा है?) ॥ ६ ॥

वसुप्रभावे वसुवीर्यसम्भवे गते वसूनेव वसुन्धराधिपे । वसूनि पुत्रांश्च वसुन्धरां तथा कुरूंश्च शोचध्वमिमां च वाहिनीम् ॥ ७ ॥

भीष्मजीमें वसु देवताओंके समान प्रभाव था। वसुओंके समान शक्तिशाली महाराज शान्तनुसे उनकी उत्पत्ति हुई थी। ये वसुधाके स्वामी भीष्म अब वसु देवताओंको ही प्राप्त हो गये हैं; अतः उनके अभावमें तुम सभी लोग अपने धन, पुत्र, वसुन्धरा, कुरुवंश, कुरुदेशकी प्रजा तथा इस कौरव-सेनाके लिये शोक करो ॥ ७ ॥