भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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संजय उवाच

महाप्रभावे वरदे निपातिते
लोकेश्वरे शास्तरि चामितौजसि ।
पराजितेषु भरतेषु दुर्मनाः
कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तयन् ॥ ८ ॥
**संजय कहते हैं—**महान् प्रभावशाली वर देनेमें समर्थ लोकेश्वर शासक तथा अमित तेजस्वी भीष्मके मारे जानेपर भरतवंशियोंकी पराजय होनेसे कर्ण मन-ही-मन बहुत दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ लंबी साँस खींचने लगा ॥ ८ ॥

इदं च राधेयवचो निशम्य
सुताश्च राजंस्तव सैनिकाश्च ह ।
परस्परं चुक्रुशुरार्तिजं मुहु-
स्तदाश्रु नेत्रैर्मुमुचुश्च शब्दवत् ॥ ९ ॥
राजन्! राधानन्दन कर्णकी यह बात सुनकर आपके पुत्र और सैनिक एक-दूसरेकी ओर देखकर शोकवश बारंबार फूट-फूटकर रोने तथा नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ९ ॥

प्रवर्तमाने तु पुनर्महाहवे
विगाह्यमानासु चमूषु पार्थिवैः ।
अथाब्रवीद्धर्षकरं तदा वचो
रथर्षभान् सर्वमहारथर्षभः ॥ १० ॥
पाण्डवसेनाके राजालोगोंद्वारा जब कौरव-सेनाका ध्वंस होने लगा और बड़ा भारी संग्राम आरम्भ हो गया, तब सम्पूर्ण महारथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त श्रेष्ठ रथियोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाता हुआ इस प्रकार बोला— ॥

जगत्यनित्ये सततं प्रधावति
प्रचिन्तयन्नस्थिरमद्य लक्षये ।
भवत्सु तिष्ठत्स्विह पातितो मृधे
गिरिप्रकाशः कुरुपुङ्गवः कथम् ॥ ११ ॥