भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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‘सदा मृत्युकी ओर दौड़ लगानेवाले इस अनित्य संसारमें आज मुझे बहुत चिन्तन करनेपर भी कोई वस्तु स्थिर नहीं दिखायी देती; अन्यथा युद्धमें आप-जैसे शूरवीरोंके रहते हुए पर्वतके समान प्रकाशित होनेवाले कुरुश्रेष्ठ भीष्म कैसे मार गिराये गये? ।। ११ ।।

निपातिते शान्तनवे महारथे
दिवाकरे भूतलमास्थिते यथा ।
न पार्थिवाः सोढुमलं धनंजयं
गिरिप्रवोढारमिवानिलं द्रुमाः ॥ १२ ॥

‘महारथी शान्तनुनन्दन भीष्मका रणमें गिराया जाना सूर्यके आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर आ पड़नेके समान है। यह हो जानेपर समस्त भूपाल अर्जुनका वेग सहन करनेमें असमर्थ हैं, जैसे पर्वतोंको भी ढोनेवाले वायुका वेग साधारण वृक्ष नहीं सह सकते हैं ।। १२ ।।

हतप्रधानं त्विदमार्तरूपं
परैर्हतोत्साहमनाथमद्य वै ।