भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

मया कुरूणां परिपाल्यमाहवे बलं यथा तेन महात्मना तथा ।। १३ ।। ‘आज यह कौरवदल अपने प्रधान सेनापतिके मारे जानेसे अनाथ एवं अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। शत्रुओंने इसके उत्साहको नष्ट कर दिया है। इस समय संग्रामभूमिमें मुझे इस कौरवसेनाकी उसी प्रकार रक्षा करनी है, जैसे महात्मा भीष्म किया करते थे ।। १३ ।।

समाहितं चात्मनि भारमीदृशं जगत् तथानित्यमिदं च लक्ष्ये । निपातितं चाहवशौण्डमाहवे कथं नु कुर्यामहमीदृशे भयम् ।। १४ ।। ‘मैंने यह भार अपने ऊपर ले लिया। जब मैं यह देखता हूँ कि सारा जगत् अनित्य है तथा युद्धकुशल भीष्म भी युद्धमें मारे गये हैं, तब ऐसे अवसरपर मैं भय किस लिये करूँ? ।। १४ ।।

अहं तु तान् कुरुवृषभानजिह्मगैः प्रवेशयन् यमसदनं चरन् रणे । यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुनः ।। १५ ।। ‘मैं उन कुरुप्रवर पाण्डवोंको अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा यमलोकमें पहुँचाकर रणभूमिमें विचरूँगा और संसारमें उत्तम यशका विस्तार करके रहूँगा अथवा शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर युद्धभूमिमें सदाके लिये सो जाऊँगा ।। १५ ।।

युधिष्ठिरो धृतिमतिसत्यसत्त्ववान् वृकोदरो गजशततुल्यविक्रमः । तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो युवा न तद्बलं सुजयमिहामरैरपि ।। १६ ।। ‘युधिष्ठिर धैर्य, बुद्धि, सत्य और सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं। भीमसेनका पराक्रम सैकड़ों हाथियोंके समान है तथा अर्जुन भी देवराज इन्द्रके पुत्र एवं तरुण हैं। अतः पाण्डवोंकी सेनाको सम्पूर्ण देवता भी सुगमतापूर्वक नहीं जीत सकते ।। १६ ।।

यमौ रणे यत्र यमोपमौ बले ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुतः । न तद्बलं कापुरुषोऽभ्युपेयिवान् निवर्तते मृत्युमुखान्न चासुभृत् ।। १७ ।। ‘जहाँ रणभूमिमें यमराजके समान नकुल और सहदेव विद्यमान हैं, जहाँ सात्यकि तथा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उस सेनामें कोई कायर मनुष्य प्रवेश कर जाय तो वह मौतके मुखसे जीवित नहीं निकल सकता ।। १७ ।।

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