महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मया कुरूणां परिपाल्यमाहवे बलं यथा तेन महात्मना तथा ।। १३ ।। ‘आज यह कौरवदल अपने प्रधान सेनापतिके मारे जानेसे अनाथ एवं अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। शत्रुओंने इसके उत्साहको नष्ट कर दिया है। इस समय संग्रामभूमिमें मुझे इस कौरवसेनाकी उसी प्रकार रक्षा करनी है, जैसे महात्मा भीष्म किया करते थे ।। १३ ।।
समाहितं चात्मनि भारमीदृशं जगत् तथानित्यमिदं च लक्ष्ये । निपातितं चाहवशौण्डमाहवे कथं नु कुर्यामहमीदृशे भयम् ।। १४ ।। ‘मैंने यह भार अपने ऊपर ले लिया। जब मैं यह देखता हूँ कि सारा जगत् अनित्य है तथा युद्धकुशल भीष्म भी युद्धमें मारे गये हैं, तब ऐसे अवसरपर मैं भय किस लिये करूँ? ।। १४ ।।
अहं तु तान् कुरुवृषभानजिह्मगैः प्रवेशयन् यमसदनं चरन् रणे । यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुनः ।। १५ ।। ‘मैं उन कुरुप्रवर पाण्डवोंको अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा यमलोकमें पहुँचाकर रणभूमिमें विचरूँगा और संसारमें उत्तम यशका विस्तार करके रहूँगा अथवा शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर युद्धभूमिमें सदाके लिये सो जाऊँगा ।। १५ ।।
युधिष्ठिरो धृतिमतिसत्यसत्त्ववान् वृकोदरो गजशततुल्यविक्रमः । तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो युवा न तद्बलं सुजयमिहामरैरपि ।। १६ ।। ‘युधिष्ठिर धैर्य, बुद्धि, सत्य और सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं। भीमसेनका पराक्रम सैकड़ों हाथियोंके समान है तथा अर्जुन भी देवराज इन्द्रके पुत्र एवं तरुण हैं। अतः पाण्डवोंकी सेनाको सम्पूर्ण देवता भी सुगमतापूर्वक नहीं जीत सकते ।। १६ ।।
यमौ रणे यत्र यमोपमौ बले ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुतः । न तद्बलं कापुरुषोऽभ्युपेयिवान् निवर्तते मृत्युमुखान्न चासुभृत् ।। १७ ।। ‘जहाँ रणभूमिमें यमराजके समान नकुल और सहदेव विद्यमान हैं, जहाँ सात्यकि तथा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उस सेनामें कोई कायर मनुष्य प्रवेश कर जाय तो वह मौतके मुखसे जीवित नहीं निकल सकता ।। १७ ।।
तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः । मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं स्वरक्षणे चाचलवद् व्यवस्थितम् ॥ १८ ॥ ‘मनस्वी पुरुष बढ़े हुए तपका तपसे और प्रचण्ड बलका बलसे ही निवारण करते हैं। यह सोचकर मेरा मन भी शत्रुओंको रोकनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए है तथा अपनी रक्षाके लिये भी पर्वतकी भाँति अविचल-भावसे स्थित है ॥ १८ ॥
एवं चैषां बाधमानः प्रभावं गत्वाहं ताञ्जय्याम्यद्य सूत । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं भग्ने सैन्ये यः समेयात् स मित्रम् ॥ १९ ॥ फिर कर्ण अपने सारथिसे कहने लगा—‘सूत! इस प्रकार मैं युद्धमें जाकर इन शत्रुओंके बढ़ते हुए प्रभावको नष्ट करते हुए आज इन्हें जीत लूँगा। मेरे मित्रोंके साथ कोई द्रोह करे, यह मुझे सह्य नहीं। जो सेनाके भाग जानेपर भी साथ देता है, वही मित्र है ॥
कर्तास्म्येतत् सत्पुरुषार्यकर्म त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि भीष्मम् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् हनिष्ये हतस्तैर्वा वीरलोकं प्रपत्स्ये ॥ २० ॥ ‘या तो मैं सत्पुरुषोंके करनेयोग्य इस श्रेष्ठ कार्यको सम्पन्न करूँगा अथवा अपने प्राणोंका परित्याग करके भीष्मजीके ही पथपर चला जाऊँगा। मैं संग्रामभूमिमें शत्रुओंके समस्त समुदायोंका संहार कर डालूँगा अथवा उन्हींके हाथसे मारा जाकर वीरलोक प्राप्त कर लूँगा ॥
सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराहते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि सूत तस्माद् राजंस्त्वद्य शत्रून् विजेष्ये ॥ २१ ॥ ‘सूत! दुर्योधनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया है। उसके स्त्री-बच्चे रो-रोकर ‘त्राहि-त्राहि’ पुकार रहे हैं। ऐसे अवसरपर मुझे क्या करना चाहिये, यह मैं जानता हूँ। अतः आज मैं राजा दुर्योधनके शत्रुओंको अवश्य जीतूँगा ॥ २१ ॥
कुरून् रक्षन् पाण्डुपुत्राञ्जिघांसं- स्त्यक्त्वा प्राणान् घोररूपे रणेऽस्मिन् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् निहत्य दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय राज्यम् ॥ २२ ॥
‘कौरवोंकी रक्षा और पाण्डवोंके वधकी इच्छा करके मैं प्राणोंकी भी परवा न कर इस महाभयंकर युद्धमें समस्त शत्रुओंका संहार कर डालूँगा और दुर्योधनको सारा राज्य सौंप दूँगा ॥ २२ ॥ निबध्यतां मे कवचं विचित्रं हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि । शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं धनुः शरांश्चाग्निविषाहिकल्पान् ॥ २३ ॥ ‘तुम मेरे शरीरमें मणियों तथा रत्नोंसे प्रकाशित सुन्दर एवं विचित्र सुवर्णमय कवच बाँध दो और मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी शिरस्त्राण रख दो। अग्नि, विष तथा सर्पके समान भयंकर बाण एवं धनुष ले आओ ॥ २३ ॥ उपासङ्गान् षोडश योजयन्तु धनूंषि दिव्यानि तथाऽऽहरन्तु । असींश्च शक्तीश्च गदाश्च गुर्वीः शङ्खं च जाम्बूनदचित्रनालम् ॥ २४ ॥ ‘मेरे सेवक बाणोंसे भरे हुए सोलह तरकश रख दें, दिव्य धनुष ले आ दें, बहुत-से खड्गों, शक्तियों, भारी गदाओं तथा सुवर्णजटित विचित्र नालवाले शंखको भी ले आकर रख दें ॥ २४ ॥ इमां रौक्मीं नागकक्ष्यां विचित्रां ध्वजं चित्रं दिव्यमिन्दीवराङ्कम् । श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानयन्तु चित्रां मालां चारुबद्धां सलाजाम् ॥ २५ ॥ हाथीको बाँधनेके लिये बनी हुई इस विचित्र सुनहरी रस्सीको तथा कमलके चिह्नसे युक्त दिव्य एवं अद्भुत ध्वजको स्वच्छ सुन्दर वस्त्रोंसे पोंछकर ले आवें। इसके सिवा सुन्दर ढंगसे गुँथी हुई विचित्र माला और खील आदि मांगलिक वस्तुएँ प्रस्तुत करें ॥ २५ ॥ अश्वानग्रयान् पाण्डुराभ्रप्रकाशान् पुष्टान् स्नातान् मन्त्रपूताभिरद्भिः । तप्तैर्भाण्डैः काञ्चनैरभ्युपेतान् शीघ्रान् शीघ्रं सूतपुत्रानयस्व ॥ २६ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे लिये श्रेष्ठ एवं शीघ्रगामी घोड़े ले आओ, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा मन्त्रपूत जलसे नहाये हुए हों, शरीरसे हृष्टपुष्ट हों और जिन्हें सोनेके आभूषणोंसे सजाया गया हो ॥ २६ ॥ रथं चाग्रयं हेममालावबद्धं रत्नैश्चित्रं सूर्यचन्द्रप्रकाशैः ।
द्रव्यैर्युक्तं सम्प्रहारोपपन्नै-
र्वाहैर्युक्तं तूर्णमावर्तयस्व ॥ २७ ॥
‘उन्हीं घोड़ोंसे जुता हुआ सुन्दर रथ शीघ्र ले आओ, जो सोनेकी मालाओंसे अलंकृत, सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होनेवाले विचित्र रत्नोंसे जटित तथा युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न हो ।। २७ ।।
चित्राणि चापानि च वेगवन्ति
ज्याश्चोत्तमाः संहननोपपन्नाः ।
तूणांश्च पूर्णान् महतः शराणा-
मासाद्य गात्रावरणानि चैव ॥ २८ ॥
‘विचित्र एवं वेगशाली धनुष, उत्तम प्रत्यंचा, कवच, बाणोंसे भरे हुए विशाल तरकश और शरीरके आवरण—इन सबको लेकर शीघ्र तैयार हो जाओ ।। २८ ।।
प्रायात्रिकं चानयताशु सर्वं
दध्ना पूर्णं वीर कांस्यं च हैमम् ।
आनीय मालामवबध्य चाङ्गे
प्रवादयन्त्वाशु जयाय भेरीः ॥ २९ ॥
‘वीर! रणयात्राकी सारी आवश्यक सामग्री, दहीसे भरे हुए कांस्य और सुवर्णके पात्र आदि सब कुछ शीघ्र ले आओ। यह सब लानेके पश्चात् मेरे गलेमें माला पहनाकर विजय-यात्राके लिये तुमलोग तुरंत नगाड़े बजवा दो ।। २९ ।।
प्रयाहि सूताशु यतः किरीटी
वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च ।
तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये
भीष्माय गच्छामि हतो द्विषद्भिः ॥ ३० ॥
‘सूत! यह सब कार्य करके तुम शीघ्र ही रथ लेकर उस स्थानपर चलो, जहाँ किरीटधारी अर्जुन, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा नकुल-सहदेव खड़े हैं। वहाँ युद्धस्थलमें उनसे भिड़कर या तो उन्हींको मार डालूँगा या स्वयं ही शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर भीष्मके पास चला जाऊँगा ।। ३० ।।
यस्मिन् राजा सत्यधृतिर्युधिष्ठिरः
समास्थितो भीमसेनार्जुनौ च ।
वासुदेवः सात्यकिः सृंजयाश्च
मन्ये बलं तदजय्यं महीपैः ॥ ३१ ॥
‘जिस सेनामें सत्यधृति राजा युधिष्ठिर खड़े हों, भीमसेन, अर्जुन, वासुदेव, सात्यकि तथा सृंजय मौजूद हों, उस सेनाको मैं राजाओंके लिये अजेय मानता हूँ ।।
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत्
सदाप्रमत्तः समरे किरीटिनम्।
तथापि हन्तास्मि समेत्य संख्ये
यास्यामि वा भीष्मपथा यमाय ॥ ३२ ॥
‘तथापि मैं समरभूमिमें सावधान रहकर युद्ध करूँगा और यदि सबका संहार करनेवाली मृत्यु स्वयं आकर अर्जुनकी रक्षा करे तो भी मैं युद्धके मैदानमें उनका सामना करके उन्हें मार डालूँगा अथवा स्वयं ही भीष्मके मार्गसे यमराजका दर्शन करनेके लिये चला जाऊँगा ॥ ३२ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
सेनापति द्रोणाचार्य
गीताप्रेस, गोरखपुर
अर्जुनका जयद्रथके मस्तकको काटकर समन्त-पञ्चक क्षेत्रसे बाहर फेंकना
गीताप्रेस, गोरखपुर
व्यासजी अर्जुनको शंकरजीकी महिमा कह रहे हैं
गीताप्रैस, गोरखपुर
भगवान्के द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा
गीताप्रेस, गोरखपुर
युधिष्ठिरकी ललकारपर दुर्योधनका पानीसे बाहर निकल आना
गीताप्रेस, गोरखपुर
भीमसेन अश्वत्थामासे प्राप्त हुई मणि द्रौपदीको दे रहे हैं
गीताप्रेस, गोरखपुर
त्रिपुर-विनाशके लिये देवताओंद्वारा शंकरजीकी स्तुति
श्रीकृष्णद्वारा अर्जुनके अश्वोंकी परिचर्या
न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां मध्ये शूराणां तत्र चाहं ब्रवीमि । मित्रद्रुहो दुर्बलभक्तयो ये पापात्मानो न ममैते सहायाः ॥ ३३ ॥ ‘अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि मैं उन शूरवीरोंके बीचमें न जाऊँ। इस विषयमें मैं इतना ही कहता हूँ कि जो मित्रद्रोही हों, जिनकी स्वामिभक्ति दुर्बल हो तथा जिनके मनमें पाप भरा हो; ऐसे लोग मेरे साथ न रहें’ ॥ ३३ ॥
संजय उवाच
समृद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं सकूबरं हेमपरिष्कृतं शुभम् । पताकिनं वातजवैर्हयोत्तमै- र्युक्तं समास्थाय ययौ जयाय ॥ ३४ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर कर्ण वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए, कूबर और पताकासे युक्त, सुवर्णभूषित, सुन्दर, समृद्धिशाली, सुदृढ़ तथा श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो युद्धमें विजय पानेके लिये चल दिया ॥ ३४ ॥
सम्पूज्यमानः कुरुभिर्महात्मा रथर्षभो देवगणैर्यथेन्द्रः। ययौ तदायोधनमुग्रधन्वा यत्रावसानं भरतर्षभस्य ॥ ३५ ॥
उस समय देवगणोंसे इन्द्रकी भाँति समस्त कौरवोंसे पूजित हो रथियोंमें श्रेष्ठ, भयंकर धनुर्धर, महामनस्वी कर्ण युद्धके उस मैदानमें गया, जहाँ भरतशिरोमणि भीष्मका देहावसान हुआ था ॥ ३५ ॥
वरूथिना महता सध्वजेन सुवर्णमुक्तामणिरत्नमालिना। सदश्वयुक्तेन रथेन कर्णो मेघस्वनेनार्क इवामितौजाः ॥ ३६ ॥
सुवर्ण, मुक्ता, मणि तथा रत्नोंकी मालासे अलंकृत सुन्दर ध्वजासे सुशोभित, उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा अमित तेजस्वी कर्ण विशाल सेना साथ लिये युद्धभूमिकी ओर चल दिया ॥ ३६ ॥
हुताशनाभः स हुताशनप्रभे शुभः शुभे वै स्वरथे धनुर्धरः। स्थितो रराजाधिरथिर्महारथः स्वयं विमाने सुरराडिवास्थितः ॥ ३७ ॥
अग्निके समान तेजस्वी अपने सुन्दर रथपर बैठा हुआ अग्निसदृश कान्तिमान्, सुन्दर एवं धनुर्धर महारथी अधिरथपुत्र कर्ण विमानमें विराजमान देवराज इन्द्रके समान सुशोभित हुआ ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णनिर्याणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें कर्णकी रणयात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं।)
तृतीयोऽध्यायः
भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन
संजय उवाच
शरतल्पे महात्मानं शयानममितौजसम् ।
महावातसमूहेन समुद्रमिव शोषितम् ।। १ ।।
**संजय कहते हैं—**महाराज! अमित तेजस्वी महात्मा भीष्म बाण-शय्यापर सो रहे थे। उस समय वे प्रलयकालीन महावायुसमूहसे सोख लिये गये समुद्रके समान जान पड़ते थे ।। १ ।।
दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रान्तकं गुरुम् ।
दिव्यैरस्त्रैर्महेष्वासं पतितं सव्यसाचिना ।। २ ।।
जयाशा तव पुत्राणां सम्भग्ना शर्म वर्म च ।
अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम् ।। ३ ।।
समस्त क्षत्रियोंका अन्त करनेमें समर्थ गुरु एवं पितामह महाधनुर्धर भीष्मको सव्यसाची अर्जुनने अपने दिव्यास्त्रोंके द्वारा मार गिराया था। उन्हें उस अवस्थामें देखकर आपके पुत्रोंकी विजयकी आशा भंग हो गयी। उन्हें अपने कल्याणकी भी आशा नहीं रही। उनके रक्षाकवच भी छिन्न-भिन्न हो गये। कहीं पार न पानेवाले तथा अथाह समुद्रमें थाह चाहनेवाले कौरवोंके लिये भीष्मजी द्वीपके समान आश्रय थे, जो पार्थद्वारा धराशायी कर दिये गये थे ।। २-३ ।।
स्रोतसा यामुनेनेव शरौघेन परिप्लुतम् ।
महेन्द्रेणेव मैनाकमसह्यं भुवि पातितम् ।। ४ ।।
वे यमुनाके जलप्रवाहके समान बाणसमूहसे व्याप्त हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो महेन्द्रने असह्य मैनाक पर्वतको धरतीपर गिरा दिया हो ।। ४ ।।
नभश्च्युतमिवादित्यं पतितं धरणीतले ।
शतक्रतुमिवाचिन्त्यं पुरा वृत्रेण निर्जितम् ।। ५ ।।
वे आकाशसे च्युत होकर पृथ्वीपर पड़े हुए सूर्यके समान तथा पूर्वकालमें वृत्रासुरसे पराजित हुए अचिन्त्य देवराज इन्द्रके सदृश प्रतीत होते थे ।। ५ ।।
मोहनं सर्वसैन्यस्य युधि भीष्मस्य पातनम् ।
ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम् ।। ६ ।।
धनंजयशरैर्व्याप्तं पितरं ते महाव्रतम् ।
तं वीरशयने वीरं शयानं पुरुषर्षभम् ।। ७ ।।
भीष्ममाधिरथिर्दृष्ट्वा भरतानां महाद्युतिः ।
अवतीर्य रथादार्तो बाष्पव्याकुलिताक्षरम् ।। ८ ।।
अभिवाद्याञ्जलिं बद्ध्वा वन्दमानोऽभ्यभाषत ।
उस युद्धस्थलमें भीष्मका गिराया जाना समस्त सैनिकोंको मोहमें डालनेवाला था। आपके ज्येष्ठ पिता महान् व्रतधारी भीष्म समस्त सैनिकोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंके शिरोमणि थे। वे अर्जुनके बाणोंसे व्याप्त होकर वीरशय्यापर सो रहे थे। उन भरतवंशी वीर पुरुषप्रवर भीष्मको उस अवस्थामें देखकर अधिरथपुत्र महातेजस्वी कर्ण अत्यन्त आर्त होकर रथसे उतर पड़ा और अंजलि बाँध अभिवादनपूर्वक प्रणाम करके आँसूसे गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोला— ॥ ६—८ १/२ ॥
कर्णोऽहमस्मि भद्रं ते वद मामभि भारत ॥ ९ ॥
पुण्यया क्षेम्यया वाचा चक्षुषा चावलोकय ।
‘भारत! आपका कल्याण हो। मैं कर्ण हूँ। आप अपनी पवित्र एवं मंगलमयी वाणीद्वारा मुझसे कुछ कहिये और कल्याणमयी दृष्टिद्वारा मेरी ओर देखिये ॥
न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित् समश्नुते ॥ १० ॥
यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह ।
‘निश्चय ही इस लोकमें कोई भी अपने पुण्यकर्मोंका फल यहाँ नहीं भोगता है; क्योंकि आप वृद्धावस्थातक सदा धर्ममें ही तत्पर रहे हैं, तो भी यहाँ इस दशामें धरतीपर सो रहे हैं ॥ १० १/२ ॥
कोशसंचयने मन्त्रे व्यूहे प्रहरणेषु च ॥ ११ ॥
नाहमन्यं प्रपश्यामि कुरूणां कुरुपुङ्गव ।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो यः कुरूंस्तारयेद् भयात् ॥ १२ ॥
योधांस्तु बहुधा हत्वा पितृलोकं गमिष्यति । ‘कुरुश्रेष्ठ! कोश-संग्रह, मन्त्रणा, व्यूह-रचना तथा अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारमें आपके समान कौरववंशमें दूसरा कोई मुझे नहीं दिखायी देता, जो अपनी विशुद्ध बुद्धिसे युक्त हो समस्त कौरवोंको भयसे उबार सके तथा यहाँ बहुत-से योद्धाओंका वध करके अन्तमें पितृ-लोकको प्राप्त हो ।।
अद्यप्रभृति संक्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षयम् ।। १३ ।।
पाण्डवा भरतश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षयम् ।
‘भरतश्रेष्ठ! आजसे क्रोधमें भरे हुए पाण्डव उसी प्रकार कौरवोंका विनाश करेंगे, जैसे व्याघ्र हिरनोंका ।।
अद्य गाण्डीवघोषस्य वीर्यज्ञाः सव्यसाचिनः ।। १४ ।।
कुरवः संत्रसिष्यन्ति वज्रपाणेरिवासुराः ।
‘आज गाण्डीवकी टंकार करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जाननेवाले कौरव उनसे उसी प्रकार डरेंगे, जैसे वज्रधारी इन्द्रसे असुर भयभीत होते हैं ।।
अद्य गाण्डीवमुक्ताना-
मशनीनामिव स्वनः ।। १५ ।।
त्रासयिष्यति बाणानां
कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ।
‘आज गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंका वज्रपातके समान शब्द कौरवों तथा अन्य राजाओंको भयभीत कर देगा ।। १५ १/२ ।।
समिद्धोऽग्निर्यथा वीर
महाज्वालो द्रुमान् दहेत् ।। १६ ।।
धार्तराष्ट्रान् प्रधक्ष्यन्ति
तथा बाणाः किरीटिनः ।
‘वीर! जैसे बड़ी-बड़ी लपटोंसे युक्त प्रज्वलित हुई आग वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनके बाण धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा उनके सैनिकोंको जला डालेंगे ।। १६ १/२ ।।
येन येन प्रसरतो वाय्वग्नी सहितौ वने ।। १७ ।।
तेन तेन प्रदहतो भूरिगुल्मतृणद्रुमान् ।
‘वायु और अग्निदेव—ये दोनों एक साथ वनमें जिस-जिस मार्गसे फैलते हैं, उसी-उसीके द्वारा बहुत-से तृण, वृक्ष और लताओंको भस्म करते जाते हैं ।।
यादृशोऽग्निः समृद्धस्तादृक् पार्थो न संशयः ।। १८ ।।
यथा वायुर्नरव्याघ्र तथा कृष्णो न संशयः ।
‘पुरुषसिंह! जैसी प्रज्वलित अग्नि होती है, वैसे ही कुन्तीकुमार अर्जुन हैं—इसमें संशय नहीं है और जैसी वायु होती है, वैसे ही श्रीकृष्ण हैं, इसमें भी संशय नहीं है ॥ १८ १/२ ॥
नदतः पाञ्चजन्यस्य रसतो गाण्डिवस्य च ॥ १९ ॥
श्रुत्वा सर्वाणि सैन्यानि त्रासं यास्यन्ति भारत ।
‘भारत! बजते हुए पांचजन्य और टंकारते हुए गाण्डीव धनुषकी भयंकर ध्वनि सुनकर आज सारी कौरव सेनाएँ भयभीत हो उठेंगी ॥ १९ १/२ ॥
कपिध्वजस्योत्यततो रथस्यामित्रकर्षणः ॥ २० ॥
शब्दं सोढुं न शक्ष्यन्ति त्वामृते वीर पार्थिवाः ।
‘वीर! शत्रुसूदन कपिध्वज अर्जुनके उड़ते हुए रथकी घरघराहटको आपके सिवा दूसरे राजा नहीं सह सकेंगे ॥ २० १/२ ॥
को ह्यर्जुनं योधयितुं त्वदन्यः पार्थिवोऽर्हति ॥ २१ ॥
यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः ।
अमानुषैश्च संग्रामस्त्र्यम्बकेण महात्मना ॥ २२ ॥
तस्माच्चैव वरं प्राप्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुं पूर्वं यो न जितस्त्वया ॥ २३ ॥
‘आपके सिवा दूसरा कौन राजा अर्जुनसे युद्ध कर सकता है? मनीषी पुरुष जिनके दिव्य कर्मोंका बखान करते हैं, जो मानवेतर प्राणियों—असुरों तथा दैत्योंसे भी संग्राम कर चुके हैं, त्रिनेत्रधारी महात्मा भगवान् शंकरके साथ भी जिन्होंने युद्ध किया है और उनसे वह उत्तम वर प्राप्त किया है, जो अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है, जिन्हें पहले आप भी जीत नहीं सके हैं, उन्हें आज दूसरा कौन युद्धमें जीत सकता है? ॥ २१—२३ ॥
जितो येन रणे रामो भवता वीर्यशालिना ।
क्षत्रियान्तकरो घोरो देवदानवदर्पहा ॥ २४ ॥
‘आप अपने पराक्रमसे शोभा पानेवाले वीर थे। आपने देवताओं तथा दानवोंका दर्प दलन करनेवाले क्षत्रियहन्ता घोर परशुरामजीको भी युद्धमें जीत लिया है ॥ २४ ॥
तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड-
ममृष्यमाणो भवता चानुशिष्टः ।
आशीविषं दृष्टिहरं सुघोरं
शूरं शक्ष्याम्यस्त्रबलान्निहन्तुम् ॥ २५ ॥
‘आज यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अमर्षमें भरकर दृष्टि हर लेनेवाले विषधर सर्पके समान अत्यन्त भयंकर युद्धकुशल शूरवीर पाण्डुपुत्र अर्जुनको अपने अस्त्रबलसे मार सकूँगा’ ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णवाक्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेक पर्वमें कर्णवाक्यविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥