महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘कौरवोंकी रक्षा और पाण्डवोंके वधकी इच्छा करके मैं प्राणोंकी भी परवा न कर इस महाभयंकर युद्धमें समस्त शत्रुओंका संहार कर डालूँगा और दुर्योधनको सारा राज्य सौंप दूँगा ॥ २२ ॥ निबध्यतां मे कवचं विचित्रं हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि । शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं धनुः शरांश्चाग्निविषाहिकल्पान् ॥ २३ ॥ ‘तुम मेरे शरीरमें मणियों तथा रत्नोंसे प्रकाशित सुन्दर एवं विचित्र सुवर्णमय कवच बाँध दो और मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी शिरस्त्राण रख दो। अग्नि, विष तथा सर्पके समान भयंकर बाण एवं धनुष ले आओ ॥ २३ ॥ उपासङ्गान् षोडश योजयन्तु धनूंषि दिव्यानि तथाऽऽहरन्तु । असींश्च शक्तीश्च गदाश्च गुर्वीः शङ्खं च जाम्बूनदचित्रनालम् ॥ २४ ॥ ‘मेरे सेवक बाणोंसे भरे हुए सोलह तरकश रख दें, दिव्य धनुष ले आ दें, बहुत-से खड्गों, शक्तियों, भारी गदाओं तथा सुवर्णजटित विचित्र नालवाले शंखको भी ले आकर रख दें ॥ २४ ॥ इमां रौक्मीं नागकक्ष्यां विचित्रां ध्वजं चित्रं दिव्यमिन्दीवराङ्कम् । श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानयन्तु चित्रां मालां चारुबद्धां सलाजाम् ॥ २५ ॥ हाथीको बाँधनेके लिये बनी हुई इस विचित्र सुनहरी रस्सीको तथा कमलके चिह्नसे युक्त दिव्य एवं अद्भुत ध्वजको स्वच्छ सुन्दर वस्त्रोंसे पोंछकर ले आवें। इसके सिवा सुन्दर ढंगसे गुँथी हुई विचित्र माला और खील आदि मांगलिक वस्तुएँ प्रस्तुत करें ॥ २५ ॥ अश्वानग्रयान् पाण्डुराभ्रप्रकाशान् पुष्टान् स्नातान् मन्त्रपूताभिरद्भिः । तप्तैर्भाण्डैः काञ्चनैरभ्युपेतान् शीघ्रान् शीघ्रं सूतपुत्रानयस्व ॥ २६ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे लिये श्रेष्ठ एवं शीघ्रगामी घोड़े ले आओ, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा मन्त्रपूत जलसे नहाये हुए हों, शरीरसे हृष्टपुष्ट हों और जिन्हें सोनेके आभूषणोंसे सजाया गया हो ॥ २६ ॥ रथं चाग्रयं हेममालावबद्धं रत्नैश्चित्रं सूर्यचन्द्रप्रकाशैः ।