भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः । मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं स्वरक्षणे चाचलवद् व्यवस्थितम् ॥ १८ ॥ ‘मनस्वी पुरुष बढ़े हुए तपका तपसे और प्रचण्ड बलका बलसे ही निवारण करते हैं। यह सोचकर मेरा मन भी शत्रुओंको रोकनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए है तथा अपनी रक्षाके लिये भी पर्वतकी भाँति अविचल-भावसे स्थित है ॥ १८ ॥

एवं चैषां बाधमानः प्रभावं गत्वाहं ताञ्जय्याम्यद्य सूत । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं भग्ने सैन्ये यः समेयात् स मित्रम् ॥ १९ ॥ फिर कर्ण अपने सारथिसे कहने लगा—‘सूत! इस प्रकार मैं युद्धमें जाकर इन शत्रुओंके बढ़ते हुए प्रभावको नष्ट करते हुए आज इन्हें जीत लूँगा। मेरे मित्रोंके साथ कोई द्रोह करे, यह मुझे सह्य नहीं। जो सेनाके भाग जानेपर भी साथ देता है, वही मित्र है ॥

कर्तास्म्येतत् सत्पुरुषार्यकर्म त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि भीष्मम् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् हनिष्ये हतस्तैर्वा वीरलोकं प्रपत्स्ये ॥ २० ॥ ‘या तो मैं सत्पुरुषोंके करनेयोग्य इस श्रेष्ठ कार्यको सम्पन्न करूँगा अथवा अपने प्राणोंका परित्याग करके भीष्मजीके ही पथपर चला जाऊँगा। मैं संग्रामभूमिमें शत्रुओंके समस्त समुदायोंका संहार कर डालूँगा अथवा उन्हींके हाथसे मारा जाकर वीरलोक प्राप्त कर लूँगा ॥

सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराहते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि सूत तस्माद् राजंस्त्वद्य शत्रून् विजेष्ये ॥ २१ ॥ ‘सूत! दुर्योधनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया है। उसके स्त्री-बच्चे रो-रोकर ‘त्राहि-त्राहि’ पुकार रहे हैं। ऐसे अवसरपर मुझे क्या करना चाहिये, यह मैं जानता हूँ। अतः आज मैं राजा दुर्योधनके शत्रुओंको अवश्य जीतूँगा ॥ २१ ॥

कुरून् रक्षन् पाण्डुपुत्राञ्जिघांसं- स्त्यक्त्वा प्राणान् घोररूपे रणेऽस्मिन् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् निहत्य दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय राज्यम् ॥ २२ ॥