महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 477, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुत्रवियोगके कारण होनेवाली गहरी मनोव्यथामें डूबे हुए थे और तीव्र शोक उन्हें संतप्त कर रहा था। भगवान् बोले—‘मित्र! ऐसे व्याकुल न होओ।। ६५-६६ ।। सर्वेषामेष वै पन्थाः शूराणामनिवर्तिनाम् । क्षत्रियाणां विशेषेण येषां युद्धेन जीविका ।। ६७ ।। ‘युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सभी शूरवीरोंका यही मार्ग है। विशेषतः उन क्षत्रियोंको, जिनकी युद्धसे जीविका चलती है, इस मार्गसे जाना ही पड़ता है ।। ६७ ।। एषा वै युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । विहिता सर्वशास्त्रज्ञैर्गतिर्मतिमतां वर ।। ६८ ।। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वीर! जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं, उन युद्धपरायण शूरवीरोंके लिये सम्पूर्ण शास्त्रज्ञोंने यही गति निश्चित की है ।। ६८ ।। ध्रुवं हि युद्धे मरणं शूराणामनिवर्तिनाम् । गतः पुण्यकृतां लोकानभिमन्युर्न संशयः ।। ६९ ।। ‘पीछे पैर न हटानेवाले शूरवीरोंका युद्धमें मरण अवश्यम्भावी है। अभिमन्यु पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकमें गया है, इसमें संशय नहीं है ।। ६९ ।। एतच्च सर्ववीराणां काङ्क्षितं भरतर्षभ । संग्रामेऽभिमुखो मृत्युं प्राप्नुयादिति मानद ।। ७० ।। ‘दूसरोंको मान देनेवाले भरतश्रेष्ठ! संग्राममें सम्मुख युद्ध करते हुए वीरको मृत्युकी प्राप्ति हो, यही सम्पूर्ण शूरवीरोंका अभीष्ट मनोरथ हुआ करता है ।। ७० ।। स च वीरान् रणे हत्वा राजपुत्रान् महाबलान् । वीरैराकाङ्क्षितं मृत्युं सम्प्राप्तोऽभिमुखं रणे ।। ७१ ।। ‘अभिमन्युने रणक्षेत्रमें महाबली वीर राजकुमारोंका वध करके वीर पुरुषोंद्वारा अभिलषित संग्राममें सम्मुख मृत्यु प्राप्त की है ।। ७१ ।। मा शुचः पुरुषव्याघ्र पूर्वैरेष सनातनः । धर्मकृद्भिः कृतो धर्मः क्षत्रियाणां रणे क्षयः ।। ७२ ।। ‘पुरुषसिंह! शोक न करो। प्राचीन धर्मशास्त्रकारोंने संग्राममें वध होना क्षत्रियोंका सनातनधर्म नियत किया है ।। ७२ ।। इमे ते भ्रातरः सर्वे दीना भरतसत्तम । त्वयि शोकसमाविष्टे नृपाश्च सुहृदस्तव ।। ७३ ।। ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे शोकाकुल हो जानेसे ये तुम्हारे सभी भाई, नरेशगण तथा सुहृद् दीन हो रहे हैं ।। ७३ ।। एतांश्च वचसा साम्ना समाश्वासय मानद । विदितं वेदितव्यं ते न शोकं कर्तुमर्हसि ।। ७४ ।।