महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदाध्यायिनमत्यर्थं संशितं वा द्विजोत्तमम् ।। २९ ।। अवमन्यमानो यान् याति वृद्धान् साधून् गुरूस्तथा । स्पृशतो ब्राह्मणं गां च पादेनाग्निं च या भवेत् ।। ३० ।। याऽप्सु श्लेष्म पुरीषं च मूत्रं वा मुञ्चतां गतिः । तां गच्छेयं गतिं कष्टां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३१ ।। वेदोंका स्वाध्याय अथवा अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणकी तथा बड़े-बूढ़ों, साधु-पुरुषों और गुरुजनोंकी अवहेलना करनेवाला पुरुष जिन नरकोंमें पड़ता है, ब्राह्मण, गौ और अग्निको पैरसे छूनेवाले पुरुषकी जो गति होती है तथा जलमें थूक अथवा मल-मूत्र छोड़नेवालोंकी जो दुर्गति होती है, यदि मैं कल जयद्रथको न मारूँ तो उसी कष्टदायिनी गतिको मैं भी प्राप्त करूँ ।। २९—३१ ।। नग्नस्य स्नायमानस्य या च वन्ध्यातिथेर्गतिः । उत्कोचिनां मृषोक्तीनां वञ्चकानां च या गतिः ।। ३२ ।। आत्मापहारिणां या च या च मिथ्याभिशंसिनाम् । भृत्यैः संदिश्यमानानां पुत्रदाराश्रितैस्तथा ।। ३३ ।। असंविभज्य क्षुद्राणां या गतिर्मिष्टमश्नताम् । तां गच्छेयं गतिं घोरां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३४ ।। नंगे नहानेवाले तथा अतिथिको भोजन दिये बिना ही उसे असफल लौटा देनेवाले पुरुषकी जो गति होती है; घूसखोर, असत्यवादी तथा दूसरोंके साथ वंचना (ठगी) करनेवालोंकी जो दुर्गति होती है; आत्माका हनन करनेवाले, दूसरोंपर झूठे दोषारोपण करनेवाले, भृत्योंकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले तथा स्त्री, पुत्र एवं आश्रित जनोंके साथ यथायोग्य बँटवारा किये बिना ही अकेले मिष्टान्न उड़ानेवाले क्षुद्र पुरुषोंको जिस घोर नारकी गतिकी प्राप्ति होती है, यदि मैं कल जयद्रथको न मारूँ तो मुझे भी वही दुर्गति प्राप्त हो ।। ३२—३४ ।। संश्रितं चापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् । न बिभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम् ।। ३५ ।। अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो न ददाति च । अनर्हेभ्यश्च यो दद्याद् वृषलीपत्तये तथा ।। ३६ ।। मद्यपो भिन्नमर्यादः कृतघ्नो भर्तृनिन्दकः । तेषां गतिमिया क्षिप्रं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३७ ।। जो नृशंस स्वभावका मनुष्य शरणागत, साधुपुरुष तथा आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले पुरुषको त्यागकर उसका भरण-पोषण नहीं करता, जो उपकारीकी निन्दा करता है, पड़ोसमें रहनेवाले योग्य व्यक्तिको श्राद्धका दान नहीं देता और अयोग्य व्यक्तियोंको तथा शूद्राके स्वामी ब्राह्मणको देता है, जो मद्य पीनेवाला, धर्म-मर्यादाको तोड़नेवाला, कृतघ्न