महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 488, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर स्वामीकी निन्दा करनेवाला है—इन सभी लोगोंको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसीको मैं भी शीघ्र ही प्राप्त करूँ; यदि कल जयद्रथका वध न कर डालूँ ।। ३५—३७ ।। भुञ्जानानां तु सव्येन उत्सङ्गे चापि खादताम् । पालाशमासनं चैव तिन्दुकैर्दन्तधावनम् ।। ३८ ।। ये चावर्जयतां लोकाः स्वपतां च तथोषसि । जो बायें हाथसे भोजन करते हैं, गोदमें रखकर खाते हैं, जो पलासके आसनका और तेंदूकी दातुनका त्याग नहीं करते तथा उषःकालमें सोते हैं, उनको जो नरकलोक प्राप्त होते हैं (वे ही मुझे भी मिले; यदि मैं जयद्रथको न मार डालूँ) ।। ३८१/२ ।। शीतभीताश्च ये विप्रा रणभीताश्च क्षत्रियाः ।। ३९ ।। एककूपोदकग्रामे वेदध्वनिविवर्जिते । षण्मासं तत्र वसतां तथा शास्त्रं विनिन्दताम् ।। ४० ।। दिवामैथुनिनां चापि दिवसेषु च शेरते । अगारदाहिनां चैव गरदानां च ये मताः ।। ४१ ।। अग्न्यातिथ्यविहीनाश्च गोपानेषु च विघ्नदाः । रजस्वलां सेवयन्तः कन्यां शुल्केन दायिनः ।। ४२ ।। या च वै बहुयाजिनां ब्राह्मणानां श्ववृत्तिनाम् । आस्यमैथुनिकानां च ये दिवा मैथुने रताः ।। ४३ ।। ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य यो वै लोभाद् ददाति न । तेषां गतिं गमिष्यामि श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।। ४४ ।। जो ब्राह्मण होकर सर्दीसे और क्षत्रिय होकर युद्धसे डरते हैं, जिस गाँवमें एक ही कुएँका जल पीया जाता हो और जहाँ कभी वेदमन्त्रोंकी ध्वनि न हुई हो, ऐसे स्थानोंमें जो छः महीनोंतक निवास करते हैं, जो शास्त्रकी निन्दामें तत्पर रहते, दिनमें मैथुन करते और सोते हैं, जो दूसरोंके घरोंमें आग लगाते और दूसरोंको जहर दे देते हैं, जो कभी अग्निहोत्र और अतिथि-सत्कार नहीं करते तथा गायोंके पानी पीनेमें विघ्न डालते हैं, जो रजस्वला स्त्रीका सेवन करते और शुल्क लेकर कन्या देते हैं, जो बहुतोंकी पुरोहिती करते, ब्राह्मण होकर सेवा-वृत्तिसे जीविका चलाते, मुँहमें मैथुन करते अथवा दिनमें स्त्री-सहवास करते हैं, जो ब्राह्मणको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर लोभवश नहीं देते हैं, उन सबको जिन लोकों अथवा दुर्गतिकी प्राप्ति होती है, उन्हींको मैं भी प्राप्त होऊँ; यदि कलतक जयद्रथको न मार डालूँ ।। ३९—४४ ।। धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः । ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ।। ४५ ।। यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।