भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

कल मैं मांसभोजी प्राणियोंको तृप्त कर दूँगा, शत्रु-सैनिकोंको मार भगाऊँगा, सुहृदोंको आनन्द प्रदान करूँगा और सिन्धुराज जयद्रथको मथ डालूँगा ॥ १६ ॥ बह्वागस्कृत् कुसम्बन्धी पापदेशसमुद्भवः । मया सैन्धवको राजा हतः स्वान् शोचयिष्यति ॥ १७ ॥ सिन्धुराज जयद्रथ पापपूर्ण प्रदेशमें उत्पन्न हुआ है। उसने बहुत-से अपराध किये हैं। वह एक दुष्ट सम्बन्धी है। अतः कल मेरे द्वारा मारा जाकर अपने सुजनोंको शोकमें निमग्न कर देगा ॥ १७ ॥ सर्वक्षीरान्नभोक्तारं पापाचारं रणाजिरे । मया सराजकं बाणैर्भिन्नं द्रक्ष्यसि सैन्धवम् ॥ १८ ॥ सदा सब प्रकारसे दूध-भात खानेवाले पापाचारी जयद्रथको रणांगणमें आप राजाओंसहित मेरे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुआ देखेंगे ॥ १८ ॥ तथा प्रभाते कर्तास्मि यथा कृष्ण सुयोधनः । नान्यं धनुर्धरं लोके मंस्यते मत्समं युधि ॥ १९ ॥ श्रीकृष्ण! मैं कल सबेरे ऐसा युद्ध करूँगा, जिससे दुर्योधन रणक्षेत्रके भीतर संसारके दूसरे किसी धनुर्धरको मेरे समान नहीं मानेगा ॥ १९ ॥ गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं योद्धा चाहं नरर्षभ । त्वं च यन्ता हृषीकेश किं नु स्यादजितं मया ॥ २० ॥ नरश्रेष्ठ हृषीकेश! जहाँ गाण्डीव-जैसा दिव्य धनुष है, मैं योद्धा हूँ और आप सारथि हैं, वहाँ मैं किसको नहीं जीत सकता? ॥ २० ॥ तव प्रसादाद् भगवन् किमिवास्ति रणे मम । अविषह्यं हृषीकेश किं जानन् मां विगर्हसे ॥ २१ ॥ भगवन्! आपकी कृपासे इस युद्धस्थलमें कौन-सी ऐसी शक्ति है, जो मेरे लिये असह्य हो। हृषीकेश! आप यह जानते हुए भी क्यों मेरी निन्दा करते हैं? ॥ २१ ॥ यथा लक्ष्म स्थिरं चन्द्रे समुद्रे च यथा जलम् । एवमेतां प्रतिज्ञां मे सत्यां विद्धि जनार्दन ॥ २२ ॥ जनार्दन! जैसे चन्द्रमामें काला चिह्न स्थिर है, जैसे समुद्रमें जलकी सत्ता सुनिश्चित है, उसी प्रकार आप मेरी इस प्रतिज्ञाको भी सत्य समझें ॥ २२ ॥ मावमंस्था ममास्त्राणि मावमंस्था धनुर्दृढम् । मावमंस्था बलं बाह्वोर्मावमंस्था धनंजयम् ॥ २३ ॥ प्रभो! आप मेरे अस्त्रोंका अनादर न करें। मेरे इस सुदृढ़ धनुषकी अवहेलना न करें। इन दोनों भुजाओंके बलका तिरस्कार न करें और अपने इस सखा धनंजयका अपमान न करें ॥ २३ ॥ तथाभियामि संग्रामं न जीयेयं जयामि च ।