महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 505, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेन सत्येन संग्रामे हतं विद्धि जयद्रथम् ॥ २४ ॥
मैं संग्राममें इस प्रकार चलूँगा, जिससे कोई मुझे जीत न सके, वरं मैं ही विजयी होऊँ। इस सत्यके प्रभावसे आप रणक्षेत्रमें जयद्रथको मारा गया ही समझें ॥
ध्रुवं वै ब्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु संनतिः ।
श्रीर्ध्रुवापि च यज्ञेषु ध्रुवो नारायणे जयः ॥ २५ ॥
जैसे ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मणमें सत्य, साधुपुरुषोंमें नम्रता और यज्ञोंमें लक्ष्मीका होना ध्रुव सत्य है, उसी प्रकार जहाँ आप नारायण विद्यमान हैं, वहाँ विजय भी अटल है ॥ २५ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं स्वयमात्मानमात्मना ।
संदिदेशार्जुनो नर्दन् वासविः केशवं प्रभुम् ॥ २६ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इन्द्रकुमार अर्जुनने गर्जना करते हुए इस प्रकार उपर्युक्त बातें कहकर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता तथा सब कुछ करनेमें समर्थ अपने आत्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको स्वयं ही मनसे सोचकर इस प्रकार आदेश दिया— ॥ २६ ॥
यथा प्रभातां रजनीं कल्पितः स्याद् रथो मम ।
तथा कार्यं त्वया कृष्ण कार्यं हि महदुद्यतम् ॥ २७ ॥
‘श्रीकृष्ण! आप ऐसा प्रबन्ध कर लें कि कल सबेरा होते ही मेरा रथ तैयार हो जाय; क्योंकि हमलोगोंपर महान् कार्यभार आ पड़ा है’ ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वण्यर्जुनवाक्ये षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥