भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 507, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 507

सर्वे ते व्यथिताः सैन्यास्त्वदीया भरतर्षभ । श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! हाथी, घोड़े आदि वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे। उन सब भयंकर एवं रोमांचकारी उत्पातोंको देखकर और महाबली सव्यसाची अर्जुनकी उस भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर आपके सभी सैनिक व्यथित हो उठे ॥ ७-८ ॥

अथ कृष्णं महाबाहुरब्रवीत् पाकशासनिः । आश्वासय सुभद्रां त्वं भगिनीं स्नुषया सह ॥ ९ ॥ स्नुषां चास्या वयस्याश्च विशोकाः कुरु माधव । साम्ना सत्येन युक्तेन वचसाऽऽश्वासय प्रभो ॥ १० ॥ इधर इन्द्रकुमार महाबाहु अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'माधव! आप पुत्रवधू उत्तरासहित अपनी बहिन सुभद्राको धीरज बँधाइये। उत्तरा और उसकी सखियोंका शोक दूर कीजिये। प्रभो! शान्तिपूर्ण, सत्य और युक्तियुक्त वचनोंद्वारा इन सबको आश्वासन दीजिये' ॥ ९-१० ॥

ततोऽर्जुनगृहं गत्वा वासुदेवः सुदुर्मनाः । भगिनीं पुत्रशोकार्तामाश्वासयत दुःखिताम् ॥ ११ ॥ तब भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त उदास मनसे अर्जुनके शिविरमें गये और पुत्रशोकसे पीड़ित हुई अपनी दुखिया बहिनको आश्वासन देने लगे ॥ ११ ॥

वासुदेव उवाच

मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि कुमारं प्रति सस्नुषा । सर्वेषां प्राणिनां भीरु निष्ठैषा कालनिर्मिता ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वृष्णिनन्दिनी! तुम और पुत्रवधू उत्तरा कुमार अभिमन्युके लिये शोक न करो। भीरु! काल एक दिन सभी प्राणियोंकी ऐसी ही अवस्था कर देता है ॥ १२ ॥

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