महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुले जातस्य धीरस्य क्षत्रियस्य विशेषतः । सदृशं मरणं ह्येतत् तव पुत्रस्य मा शुचः ॥ १३ ॥ तुम्हारा पुत्र उत्तम कुलमें उत्पन्न धीर-वीर और विशेषतः क्षत्रिय था। यह मृत्यु उसके योग्य ही हुई है; इसलिये शोक न करो ॥ १३ ॥
दिष्ट्या महारथो धीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः । क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम् ॥ १४ ॥ यह सौभाग्यकी बात है कि पिताके तुल्य पराक्रमी धीर महारथी अभिमन्यु क्षत्रियोचित कर्तव्यका पालन करके उस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है, जिसकी वीर पुरुष अभिलाषा करते हैं ॥ १४ ॥
जित्वा सुबहुशः शत्रून् प्रेषयित्वा च मृत्यवे । गतः पुण्यकृतां लोकान् सर्वकामदुहोऽक्षयान् ॥ १५ ॥ वह बहुत-से शत्रुओंको जीतकर और बहुतोंको मृत्युके लोकमें भेजकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले उन अक्षय लोकोंमें गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च ।