महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 509, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसन्तो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रकः ॥ १६ ॥ तपस्या, ब्रह्मचर्य, शास्त्रज्ञान और सद्बुद्धिके द्वारा साधुपुरुष जिस गतिको पाना चाहते हैं, वही गति तुम्हारे पुत्रको भी प्राप्त हुई है ॥ १६ ॥
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा । मा शुचस्तनयं भद्रे गतः स परमां गतिम् ॥ १७ ॥ सुभद्रे! तुम वीरमाता, वीरपत्नी, वीरकन्या और वीर भाइयोंकी बहिन हो। तुम पुत्रके लिये शोक न करो। वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ १७ ॥
प्राप्स्यते चाप्यसौ पापः सैन्धवो बालघातकः । अस्यावलेपस्य फलं ससुहृद्गणबान्धवः ॥ १८ ॥ व्युष्टायां तु वरारोहे रजन्यां पापकर्मकृत् । न हि मोक्ष्यति पार्थात् स प्रविष्टोऽप्यमरावतीम् ॥ १९ ॥ वरारोहे! बालककी हत्या करानेवाला वह पापकर्मा पापी सिंधुराज जयद्रथ रात बीतनेपर प्रातःकाल होते ही अपने सुहृदों और बन्धु-बान्धवोंसहित इस अपराधका फल पायेगा। वह अमरावतीपुरीमें जाकर छिप जाय तो भी अर्जुनके हाथसे उसका छुटकारा नहीं होगा ॥ १८-१९ ॥
श्वः शिरः श्रोष्यसे तस्य सैन्धवस्य रणे हतम् । समन्तपञ्चकाद् बाह्यं विशोका भव मा रुदः ॥ २० ॥ तुम कल ही सुनोगी कि रणक्षेत्रमें जयद्रथका मस्तक काट लिया गया है और वह समन्तपंचक क्षेत्रसे बाहर जा गिरा है। अतः शोक त्याग दो और रोना बंद करो ॥ २० ॥
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गतः शूरः सतां गतिम् । यां गतिं प्राप्नुयामेह ये चान्ये शस्त्रजीविनः ॥ २१ ॥ शूरवीर अभिमन्युने क्षत्रिय-धर्मको आगे रखकर सत्पुरुषोंकी गति पायी है, जिसे हमलोग और इस संसारके दूसरे शस्त्रधारी क्षत्रिय भी पाना चाहते हैं ॥ २१ ॥
व्यूढोरस्को महाबाहुरनिवर्ती रथप्रणुत् । गतस्तव वरारोहे पुत्रः स्वर्गं ज्वरं जहि ॥ २२ ॥ सुन्दरी! चौड़ी छाती और विशाल भुजाओंसे सुशोभित युद्धसे पीछे न हटनेवाला तथा शत्रुपक्षके रथियोंपर विजय पानेवाला तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें गया है। तुम चिन्ता छोड़ो ॥ २२ ॥
अनुयातश्च पितरं मातृपक्षं च वीर्यवान् । सहस्रशो रिपून् हत्वा हतः शूरो महारथः ॥ २३ ॥ बलवान्, शूरवीर और महारथी अभिमन्यु पितृकुल तथा मातृकुलकी मर्यादाका अनुसरण करते हुए सहस्रों शत्रुओंको मारकर मरा है ॥ २३ ॥
आश्वासय स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिये भृशम् ।