महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 526, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेता है ।। ६ ।। किमर्थं च विषादस्ते तद् ब्रूहि द्विपदां वर । न शोच्यं विदुषां श्रेष्ठ शोकः कार्यविनाशनः ।। ७ ।। ‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुन! बताओ तो सही, तुम्हें किसलिये विषाद हो रहा है? विद्वद्वर! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक समस्त कर्मोंका विनाश करनेवाला है ।। ७ ।। यत् तु कार्यं भवेत् कार्यं कर्मणा तत् समाचर । हीनचेष्टस्य यः शोकः स हि शत्रुर्धनंजय ।। ८ ।। ‘जो कार्य करना हो, उसे प्रयत्नपूर्वक करो। धनंजय! उद्योगहीन मनुष्यका जो शोक है, वह उसके लिये शत्रुके समान है ।। ८ ।। शोचन् नन्दयते शत्रून् कर्शयत्यपि बान्धवान् । क्षीयते च नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि ।। ९ ।। ‘शोक करनेवाला पुरुष अपने शत्रुओंको आनन्दित करता और बन्धु-बान्धवोंको दुःखसे दुर्बल बनाता है। इसके सिवा वह स्वयं भी शोकके कारण क्षीण होता जाता है। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये’ ।। ९ ।। इत्युक्तो वासुदेवेन बीभत्सुरपराजितः । आबभाषे तदा विद्वानिदं वचनमर्थवत् ।। १० ।। वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर किसीसे पराजित न होनेवाले विद्वान् अर्जुनने यह अर्थयुक्त वचन उस समय कहा— ।। १० ।। मया प्रतिज्ञा महती जयद्रथवधे कृता । श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव ।। ११ ।। ‘केशव! मैंने जयद्रथ-वधके लिये यह भारी प्रतिज्ञा कर ली है कि कल मैं अपने पुत्रके घातक दुरात्मा सिंधुराजको अवश्य मार डालूँगा ।। ११ ।। मत्प्रतिज्ञाविघातार्थं धार्तराष्ट्रैः किलाच्युत । पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः ।। १२ ।। ‘परंतु अच्युत! धृतराष्ट्र-पक्षके सभी महारथी मेरी प्रतिज्ञा भंग करनेके लिये सिंधुराजको निश्चय ही सबसे पीछे खड़े करेंगे और वह उन सबके द्वारा सुरक्षित होगा ।। दश चैका च ताः कृष्ण अक्षौहिण्यः सुदुर्जयाः । हतावशेषास्तत्रेमा हन्त माधव संख्यया ।। १३ ।। ताभिः परिवृतः संख्ये सर्वैश्चैव महारथैः । कथं शक्येत संद्रष्टुं दुरात्मा कृष्ण सैन्धवः ।। १४ ।। ‘माधव! श्रीकृष्ण! कौरवोंकी वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ, जो अत्यन्त दुर्जय हैं और उनमें मरनेसे बचे हुए जितने सैनिक विद्यमान हैं, उनसे तथा पूर्वोक्त सभी महारथियोंसे युद्धस्थलमें घिरे होनेपर दुरात्मा सिंधुराजको कैसे देखा जा सकता है? ।। १३-१४ ।।