भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 527

प्रतिज्ञापारं चापि न भविष्यति केशव । प्रतिज्ञायां च हीनायां कथं जीवेत् मद्विधः ॥ १५ ॥ ‘केशव! ऐसी अवस्थामें प्रतिज्ञाकी पूर्ति नहीं हो सकेगी और प्रतिज्ञा भंग होनेपर मेरे-जैसा पुरुष कैसे जीवन धारण कर सकता है? ॥ १५ ॥

दुःखोपायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते । द्रुतं च याति सविता तत एतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १६ ॥ ‘वीर! अब इस कष्टसाध्य (जयद्रथवधरूपी कार्य)-की ओरसे मेरी अभिलाषा परिवर्तित हो रही है। इसके सिवा इन दिनों सूर्य जल्दी अस्त हो जाते हैं; इसलिये मैं ऐसा कह रहा हूँ' ॥ १६ ॥

शोकस्थानं तु तच्छ्रुत्वा पार्थस्य द्विजकेतनः । संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः ॥ १७ ॥ इदं वाक्यं महातेजा बभाषे पुष्करेक्षणः । हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे कृती ॥ १८ ॥ अर्जुनके शोकका आधार क्या है, यह सुनकर महातेजस्वी विद्वान् गरुड़ध्वज कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पूर्वाभिमुख होकर बैठे और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हित तथा सिंधुराज जयद्रथके वधके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ ॥

पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् । येन सर्वान् मृधे दैत्यान् जघ्ने देवो महेश्वरः ॥ १९ ॥ ‘पार्थ! पाशुपत नामक एक परम उत्तम सनातन अस्त्र है, जिससे युद्धमें भगवान् महेश्वरने समस्त दैत्योंका वध किया था ॥ १९ ॥

यदि तद् विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जयद्रथम् । अथाज्ञातं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम् ॥ २० ॥ तं देवं मनसा ध्यात्वा जोषमास्व धनंजय । ततस्तस्य प्रसादात् त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत् ॥ २१ ॥ ‘यदि वह अस्त्र आज तुम्हें विदित हो तो तुम अवश्य कल जयद्रथको मार सकते हो और यदि तुम्हें उसका ज्ञान न हो तो मन-ही-मन भगवान् वृषभध्वज (शिव)-की शरण लो। धनंजय! तुम मनमें उन महादेवजीका ध्यान करते हुए चुपचाप बैठ जाओ। तब उनके दया-प्रसादसे तुम उनके भक्त होनेके कारण उस महान् अस्त्रको प्राप्त कर लोगे' ॥ २०-२१ ॥

ततः कृष्णवचः श्रुत्वा संस्पृश्याम्भो धनंजयः । भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम् ॥ २२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्जुन जलका आचमन करके धरतीपर एकाग्र होकर बैठ गये और मनसे महादेवजीका चिन्तन करने लगे ॥ २२ ॥

ततः प्रणिहितो ब्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे ।