भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महाबलौ । कृष्णश्च युयुधानश्च महात्मानौ महाद्युती ॥ ८ ॥ महाबली और महातेजस्वी महात्मा श्रीकृष्ण और सात्यकि ये दोनों वीर एक ही आसनपर बैठे थे ॥ ८ ॥

ततो युधिष्ठिरस्तेषां शृण्वतां मधुसूदनम् । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षमभाष्य मधुरं वचः ॥ ९ ॥ तब युधिष्ठिरने उन सब लोगोंके सुनते हुए कमलनयन भगवान् मधुसूदनको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें कहा— ॥ ९ ॥

एकं त्वां वयमाश्रित्य सहस्राक्षमिवामराः । प्रार्थयामो जयं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च ॥ १० ॥ 'प्रभो! जैसे देवता इन्द्रका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार हमलोग एकमात्र आपका सहारा लेकर युद्धमें विजय और शाश्वत सुख पाना चाहते हैं ॥ १० ॥

त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रियाम् । क्लेशांश्च विविधान् कृष्ण सर्वांस्तानपि वेद नः ॥ ११ ॥ 'श्रीकृष्ण! शत्रुओंने जो हमारे राज्यका नाश करके हमारा तिरस्कार किया और भाँति-भाँतिके क्लेश दिये, उन सबको आप अच्छी तरह जानते हैं ॥ ११ ॥

त्वयि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल । सुखमायत्तमत्यर्थं यात्रा च मधुसूदन ॥ १२ ॥ 'भक्तवत्सल सर्वेश्वर! मधुसूदन! हम सब लोगोंका सुख और जीवन-निर्वाह पूर्णरूपसे आपके ही अधीन है ॥ १२ ॥

स तथा कुरु वार्ष्णेय यथा त्वयि मनो मम । अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्याच्चिकीर्षिता ॥ १३ ॥ 'वार्ष्णेय! हमारा मन आपमें ही लगा हुआ है। अतः आप ऐसा करें, जिससे अर्जुनकी अभीष्ट प्रतिज्ञा सत्य होकर रहे ॥ १३ ॥

स भवांस्तारयत्वस्माद् दुःखामर्षमहार्णवात् । पारं तितीर्षतामद्य प्लवो नो भव माधव ॥ १४ ॥ 'माधव! आज इस दुःख और अमर्षके महासागरसे पार होनेकी इच्छावाले हम सब लोगोंके लिये आप नौका बन जाइये। आप ही इस संकटसे हमारा उद्धार कीजिये ॥ १४ ॥

न हि तत् कुरुते संख्ये रथी रिपुवधोद्यतः । यथा वै कुरुते कृष्ण सारथिर्यत्नमास्थितः ॥ १५ ॥ 'श्रीकृष्ण! संग्राममें शत्रुवधके लिये उद्यत हुआ रथी भी वैसा कार्य नहीं कर पाता, जैसा कि प्रयत्नशील सारथि कर दिखाता है ॥ १५ ॥

यथैव सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीन् जनार्दन ।

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