महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 548, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथैवास्मान् महाबाहो वृजिनात् त्रातुमर्हसि ॥ १६ ॥ ‘महाबाहु जनार्दन! जैसे आप वृष्णिवंशियोंको सम्पूर्ण आपत्तियोंसे बचाते हैं, उसी प्रकार हमारी भी इस संकटसे रक्षा कीजिये ॥ १६ ॥
त्वमगाधेऽप्लवे मग्नान् पाण्डवान् कुरुसागरे । समुद्धर प्लवो भूत्वा शङ्खचक्रगदाधर ॥ १७ ॥ ‘शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले परमेश्वर! नौकारहित अगाध कौरव-सागरमें निमग्न पाण्डवोंका आप स्वयं ही नौका बनकर उद्धार कीजिये ॥ १७ ॥
नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥ ‘शत्रुनाशक! सनातन देवदेवेश्वर! विष्णो! जिष्णो! हरे! कृष्ण! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है ॥ १८ ॥
नारदस्तवां समाचख्यौ पुराणमृषिसत्तमम् । वरदं शार्ङ्गिणं श्रेष्ठं तत् सत्यं कुरु माधव ॥ १९ ॥ ‘माधव! देवर्षि नारदने बताया है कि आप शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, सर्वोत्तम वरदायक, पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नारायण हैं, उनकी वह बात सत्य कर दिखाइये ॥ १९ ॥
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो धर्मराजेन संसदि । तोयमेघस्वनो वाग्मी प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥ उस राजसभामें धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उत्तम वक्ता कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सजल मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविधः । शरासनधरः कश्चिद् यथा पार्थो धनञ्जयः ॥ २१ ॥ श्रीकृष्ण बोले—राजन्! देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कोई भी वैसा धनुर्धर नहीं है, जैसे आपके भाई कुन्तीकुमार धनंजय हैं ॥ २१ ॥
वीर्यवानस्त्रसम्पन्नः पराक्रान्तो महाबलः । युद्धशौण्डः सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम् ॥ २२ ॥ वे शक्तिशाली, अस्त्रज्ञानसम्पन्न, पराक्रमी, महाबली, युद्धकुशल, सदा अमर्षशील और मनुष्योंमें परम तेजस्वी हैं ॥ २२ ॥
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घबाहुर्महाबलः । सिंहर्षभगतिः श्रीमान् द्विषतस्ते हनिष्यति ॥ २३ ॥ अर्जुनके कंधे वृषभके समान सुपुष्ट हैं, भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं, उनकी चाल भी श्रेष्ठ सिंहके सदृश है, वे महान् बलवान् युवक और श्रीसम्पन्न हैं, अतः आपके शत्रुओंको अवश्य