भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 551

यों कहकर अर्जुनने अपने सुहृदोंके आश्वासनके लिये जिस प्रकार भगवान् शंकरसे मिलनका स्वप्न देखा था, वह सब कह सुनाया ।। ६ ।। ततः शिरोभिरवनिं स्पृष्ट्वा सर्वे च विस्मिताः । नमस्कृत्य वृषाङ्काय साधु साध्वित्यथाब्रुवन् ।। ७ ।। यह स्वप्न सुनकर वहाँ आये हुए सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे और सबने धरतीपर मस्तक टेककर भगवान् शंकरको प्रणाम करके कहा—'यह तो बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ' ।। ७ ।। अनुज्ञातास्ततः सर्वे सुहृदो धर्मसूनुना । त्वरमाणाः सुसंनद्धा हृष्टा युद्धाय निर्ययुः ।। ८ ।। तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर कवच धारण किये हुए समस्त सुहृद् हर्षमें भरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे युद्धके लिये निकले ।। ८ ।। अभिवाद्य तु राजानं युयुधानाच्युतार्जुनाः । हृष्टा विनिर्ययुस्ते वै युधिष्ठिरनिवेशनात् ।। ९ ।। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरको प्रणाम करके सात्यकि, श्रीकृष्ण और अर्जुन बड़े हर्षके साथ उनके शिविरसे बाहर निकले ।। ९ ।। रथेनैकेन दुर्धर्षौ युयुधानजनार्दनौ । जग्मतुः सहितौ वीरावर्जुनस्य निवेशनम् ।। १० ।। दुर्धर्ष वीर सात्यकि और श्रीकृष्ण एक रथपर आरूढ़ हो एक साथ अर्जुनके शिविरमें गये ।। १० ।। तत्र गत्वा हृषीकेशः कल्पयामास सूतवत् । रथं रथवरस्याजौ वानरर्षभलक्षणम् ।। ११ ।। वहाँ पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने एक सारथिके समान रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनके वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌के चिह्नसे युक्त ध्वजावाले रथको युद्धके लिये सुसज्जित किया ।। ११ ।। स मेघसमनिर्घोषस्तप्तकाञ्चनसप्रभः । बभौ रथवरः क्लृप्तः शिशुर्दिवसकृद् यथा ।। १२ ।। मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला और तपाये हुए सुवर्णके समान प्रभासे उद्भासित होनेवाला वह सजाया हुआ श्रेष्ठ रथ प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ।। १२ ।। ततः पुरुषशार्दूलः सज्जं सज्जपुरःसरः । कृताह्निकाय पार्थाय न्यवेदयत तं रथम् ।। १३ ।। तदनन्तर युद्धके लिये सुसज्जित पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ पुरुषसिंह श्रीकृष्णने नित्य-कर्म सम्पन्न करके बैठे हुए अर्जुनको यह सूचित किया कि रथ तैयार है ।। १३ ।। तं तु लोकवरः पुंसां किरीटी हेमवर्मभृत् ।