भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 552

चापबाणधरो वाहं प्रदक्षिणमवर्तत ॥ १४ ॥ तब पुरुषोंमें श्रेष्ठ लोकप्रवर अर्जुनने सोनेके कवच और किरीट धारण करके धनुष-बाण लेकर उस रथकी परिक्रमा की ॥ १४ ॥

तपोविद्यावयोवृद्धैः क्रियावद्भिर्जितेन्द्रियैः । स्तूयमानो जयाशीर्भिरारुरोह महारथम् ॥ १५ ॥ उस समय तपस्या, विद्या तथा अवस्थामें बड़े-बूढ़े, क्रियाशील, जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन्हें विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति-प्रशंसा कर रहे थे। उनकी की हुई वह स्तुति सुनते हुए अर्जुन उस विशाल रथपर आरूढ़ हुए ॥ १५ ॥

जैत्रैः सांग्रामिकैर्मन्त्रैः पूर्वमेव रथोत्तमम् । अभिमन्त्रितमर्चिष्मानुदयं भास्करो यथा ॥ १६ ॥ उस उत्तम रथको पहलेसे ही विजयसाधक युद्धसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया गया था। उसपर आरूढ़ हुए तेजस्वी अर्जुन उदयाचलपर चढ़े हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥ १६ ॥

स रथे रथिनां श्रेष्ठः काञ्चने काञ्चनावृतः । विबभौ विमलोऽर्चिष्मान् मेराविव दिवाकरः ॥ १७ ॥ सुवर्णमय कवचसे आवृत हो उस स्वर्णमय रथपर आरूढ़ हुए रथियोंमें श्रेष्ठ उज्ज्वल कान्तिधारी तेजस्वी अर्जुन मेरु पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ १७ ॥

अन्वारुरुहतुः पार्थं युयुधानजनार्दनौ । शर्यातेर्यज्ञमायान्तं यथेन्द्रं देवमश्विनौ ॥ १८ ॥ अर्जुनके बैठनेके बाद सात्यकि और श्रीकृष्ण भी उस रथपर आरूढ़ हो गये, मानो राजा शर्यातिके यज्ञमें आते हुए इन्द्रदेवके साथ दोनों अश्विनीकुमार आ रहे हों ॥ १८ ॥

अथ जग्राह गोविन्दो रश्मीन् रश्मिविदां वरः । मातलिर्वासवस्येव वृत्रं हन्तुं प्रयास्यतः ॥ १९ ॥ उन घोड़ोंकी रास पकड़नेकी कलामें सर्वश्रेष्ठ भगवान् गोविन्दने रथकी बागडोर अपने हाथमें ले ली, ठीक उसी प्रकार जैसे, वृत्रासुरका वध करनेके लिये जानेवाले इन्द्रके रथकी बागडोर मातलिने पकड़ी थी ॥ १९ ॥

स ताभ्यां सहितः पार्थो रथप्रवरमास्थितः । सहितो बुधशुक्राभ्यां तमो निघ्नन् यथा शशी ॥ २० ॥ सात्यकि और श्रीकृष्ण दोनोंके साथ उस श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए अर्जुन बुध और शुक्रके साथ स्थित हुए अन्धकारनाशक चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ २० ॥

सैन्धवस्य वधं प्रेप्सुः प्रयातः शत्रुपुंगहा । सहाम्बुपतिमित्राभ्यां यथेन्द्रस्तारकामये ॥ २१ ॥