भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 553

शत्रुसमूहका नाश करनेवाले अर्जुन जब सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ सिंधुराज जयद्रथका वध करनेकी इच्छासे प्रस्थित हुए, उस समय वरुण और मित्रके साथ तारकामय संग्राममें जानेवाले इन्द्रके समान सुशोभित हुए ॥ २१ ॥ ततो वादित्रनिर्घोषैर्माङ्गल्यैश्च स्तवैः शुभैः । प्रयान्तमर्जुनं वीरं मागधाश्चैव तुष्टुवुः ॥ २२ ॥ तदनन्तर रणवाद्योंके घोष तथा शुभ एवं मांगलिक स्तुतियोंके साथ यात्रा करते हुए वीर अर्जुनकी मागधजन स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥ सजयाशीः सपुण्याहः सूतमागधनिःस्वनः । युक्तो वादित्रघोषेण तेषां रतिकरोऽभवत् ॥ २३ ॥ विजयसूचक आशीर्वाद तथा पुण्याहवाचनके साथ सूत, मागध एवं वन्दीजनोंका शब्द रणवाद्योंकी ध्वनिसे मिलकर उन सबकी प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ २३ ॥ तमनुप्रयतो वायुः पुण्यगन्धवहः शुभः । ववौ संहर्षयन् पार्थं द्विषतश्चापि शोषयन् ॥ २४ ॥ अर्जुनके प्रस्थान करनेपर पीछेसे मंगलमय पवित्र एवं सुगन्धयुक्त वायु बहने लगी, जो अर्जुनका हर्ष बढ़ाती हुई उनके शत्रुओंका शोषण कर रही थी ॥ २४ ॥ ततस्तस्मिन् क्षणे राजन् विविधानि शुभानि च । प्रादुरासन् निमित्तानि विजयाय बहूनि च । पाण्डवानां त्वदीयानां विपरीतानि मारिष ॥ २५ ॥ माननीय महाराज! उस समय बहुत-से ऐसे शुभ शकुन प्रकट हुए, जो पाण्डवोंकी विजय और आपके सैनिकोंकी पराजयकी सूचना दे रहे थे ॥ २५ ॥ दृष्ट्वार्जुनो निमित्तानि विजयाय प्रदक्षिणम् । युयुधानं महेष्वासमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥ अर्जुनने अपने दाहिने प्रकट होनेवाले उन विजयसूचक शुभ लक्षणोंको देखकर महाधनुर्धर सात्यकिसे इस प्रकार कहा— ॥ २६ ॥ युयुधानाद्य युद्धे मे दृश्यते विजयो ध्रुवः । यथा हीमानि लिङ्गानि दृश्यन्ते शिनिपुङ्गव ॥ २७ ॥ ‘शिनिप्रवर युयुधान! आज जैसे ये शुभ लक्षण दिखायी देते हैं, उनसे युद्धमें मेरी निश्चित विजय दृष्टिगोचर हो रही है’ ॥ २७ ॥ सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र सैन्धवको नृपः । यियासुर्यमलोकाय मम वीर्यं प्रतीक्षते ॥ २८ ॥ ‘अतः मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ सिंधुराज जयद्रथ यमलोकमें जानेकी इच्छासे मेरे पराक्रमकी प्रतीक्षा कर रहा है ॥ २८ ॥ यथा परमकं कृत्यं सैन्धवस्य वधो मम ।