भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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(जयद्रथवधपर्व)

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विलाप

धृतराष्ट्र उवाच

श्वोभूते किमकार्षुस्ते दुःखशोकसमन्विताः ।
अभिमन्यौ हते तत्र के वायुध्यन्त मामकाः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! अभिमन्युके मारे जानेपर दुःख और शोकमें डूबे हुए पाण्डवोंने सबेरा होनेपर क्या किया? तथा मेरे पक्षवाले योद्धाओंमेंसे किन लोगोंने युद्ध किया? ॥ १ ॥

जानन्तस्तस्य कर्माणि कुरवः सव्यसाचिनः ।
कथं तत् किल्बिषं कृत्वा निर्भया ब्रूहि मामकाः ॥ २ ॥
सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जानते हुए भी मेरे पक्षवाले कौरव योद्धा उनका अपराध करके कैसे निर्भय रह सके? यह बताओ ॥ २ ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् ।
आयान्तं पुरुषव्याघ्रं कथं ददृशुराहवे ॥ ३ ॥
पुत्रशोकसे संतप्त हो क्रोधमें भरे हुए प्राणान्तकारी मृत्युके समान आते हुए पुरुषसिंह अर्जुनकी ओर मेरे पुत्र युद्धमें कैसे देख सके? ॥ ३ ॥

कपिराजध्वजं संख्ये विधुन्वानं महद् धनुः ।
दृष्ट्वा पुत्रपरिद्यूनं किमकुर्वत मामकाः ॥ ४ ॥
जिनकी ध्वजामें कपिराज हनुमान् विराजमान हैं, उन पुत्रवियोगसे व्यथित हुए अर्जुनको युद्धस्थलमें अपने विशाल धनुषकी टंकार करते देख मेरे पुत्रोंने क्या किया? ॥ ४ ॥

किं नु संजय संग्रामे वृत्तं दुर्योधनं प्रति ।
परिदेवो महानद्य श्रुतो मे नाभिनन्दनम् ॥ ५ ॥
संजय! संग्रामभूमिमें दुर्योधनपर क्या बीता है? इन दिनों मैंने महान् विलापकी ध्वनि सुनी है। आमोद-प्रमोदके शब्द मेरे कानोंमें नहीं पड़े हैं ॥ ५ ॥

बभूवुर्ये मनोग्राहाः शब्दाः श्रुतिसुखावहाः ।
न श्रूयन्तेऽद्य सर्वे ते सैन्धवस्य निवेशने ॥ ६ ॥