महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहले सिंधुराजके शिविरमें जो मनको प्रिय लगनेवाले और कानोंको सुख देनेवाले शब्द होते रहते थे, वे सब अब नहीं सुनायी पड़ते हैं ।। ६ ।। स्तुवतां नाद्य श्रूयन्ते पुत्राणां शिबिरे मम । सूतमागधसंघानां नर्तकानां च सर्वशः ।। ७ ।। मेरे पुत्रोंके शिविरमें अब स्तुति करनेवाले सूतों, मागधों एवं नर्तकोंके शब्द सर्वथा नहीं सुनायी पड़ते हैं ।। ७ ।। शब्देन नादिताभीक्ष्णमभवद् यत्र मे श्रुतिः । दीनानामद्य तं शब्दं न शृणोमि समीरितम् ।। ८ ।। जहाँ मेरे कान निरन्तर स्वजनोंके आनन्द-कोलाहलसे गूँजते रहते थे, वहीं आज मैं अपने दीन-दुःखी पुत्रोंके द्वारा उच्चारित वह हर्षसूचक शब्द नहीं सुन रहा हूँ ।। निवेशने सत्यधृतेः सोमदत्तस्य संजय । आसीनोऽहं पुरा तात शब्दमश्रौषमुत्तमम् ।। ९ ।। तात संजय! पहले मैं यथार्थ धैर्यशाली सोमदत्तके भवनमें बैठा हुआ उत्तम शब्द सुना करता था ।। ९ ।। तदद्य पुण्यहीनोऽहमार्तस्वरनिनादितम् । निवेशनं गतोत्साहं पुत्राणां मम लक्षये ।। १० ।। परंतु आज पुण्यहीन मैं अपने पुत्रोंके घरको उत्साहशून्य एवं आर्तनादसे गूँजता हुआ देख रहा हूँ ।। विविंशतेर्दुर्मुखस्य चित्रसेनविकर्णयोः । अन्येषां च सुतानां मे न तथा श्रूयते ध्वनिः ।। ११ ।। विविंशति, दुर्मुख, चित्रसेन, विकर्ण तथा मेरे अन्य पुत्रोंके घरोंमें अब पूर्ववत् आनन्दित ध्वनि नहीं सुनी जाती है ।। ११ ।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या यं शिष्याः पर्युपासते । द्रोणपुत्रं महेष्वासं पुत्राणां मे परायणम् ।। १२ ।। वितण्डालापसंलापैर्द्रुतवादित्रवादितैः । गीतैश्च विविधैरिष्टै रमते यो दिवानिशम् ।। १३ ।। उपास्यमानो बहुभिः कुरुपाण्डवसात्वतैः । सूत तस्य गृहे शब्दो नाद्य द्रौणेर्यथा पुरा ।। १४ ।। सूत संजय! मेरे पुत्रोंके परम आश्रय जिस महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी जातियोंके शिष्य उपासना (निकट रहकर सेवा) करते रहे हैं, जो वितण्डावाद, भाषण, पारस्परिक बातचीत, द्रुतस्वरमें बजाये हुए वाद्योंके शब्दों तथा भाँति-भाँतिके अभीष्ट गीतोंसे दिन-रात मन बहलाया करता था, जिसके पास बहुत-से कौरव,