भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 558

पाण्डव और सात्वतवंशी वीर बैठा करते थे, उस अश्वत्थामाके घरमें आज पहलेके समान हर्षसूचक शब्द नहीं हो रहा है ॥ १२—१४ ॥
द्रोणपुत्रं महेष्वासं गायना नर्तकाश्च ये ।
अत्यर्थमुपतिष्ठन्ति तेषां न श्रूयते ध्वनिः ॥ १५ ॥
महाधनुर्धर द्रोणपुत्रकी सेवामें जो गायक और नर्तक अधिक उपस्थित होते थे, उनकी ध्वनि अब नहीं सुनायी देती है ॥ १५ ॥
विन्दानुविन्दयोः सायं शिबिरे यो महाध्वनिः ॥ १६ ॥
श्रूयते सोऽद्य न तथा केकयानां च वेश्मसु ।
नित्यं प्रमुदितानां च तालगीतस्वनो महान् ॥ १७ ॥
नृत्यतां श्रूयते तात गणानां सोऽद्य न स्वनः ।
विन्द और अनुविन्दके शिविरमें संध्याके समय जो महान् शब्द सुनायी पड़ता था, वह अब नहीं सुननेमें आता है। तात सदा आनन्दित रहनेवाले केकयोंके भवनोंमें झुंड-के-झुंड नर्तकोंका ताल स्वरके साथ गीतका जो महान् शब्द सुनायी पड़ता था, वह अब नहीं सुना जाता है ॥ १६-१७ १/२ ॥
सप्त तन्तून् वितन्वाना याजका यमुपासते ॥ १८ ॥
सौमदत्तिं श्रुतनिधिं तेषां न श्रूयते ध्वनिः ।
वेद-विद्याके भण्डार जिस सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाके यहाँ सातों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले याजक सदा रहा करते थे, अब वहाँ उन ब्राह्मणोंकी आवाज नहीं सुनायी देती है ॥ १८ १/२ ॥
ज्याघोषो ब्रह्मघोषश्च तोमरासिरथध्वनिः ॥ १९ ॥
द्रोणस्यासीदविरतो गृहे तं न शृणोम्यहम् ।
द्रोणाचार्यके घरमें निरन्तर धनुषकी प्रत्यंचाका घोष, वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनि तथा तोमर, तलवार एवं रथके शब्द गूँजते रहते थे; परंतु अब मैं वहाँ वहाँ वह शब्द नहीं सुन रहा हूँ ॥ १९ १/२ ॥
नानादेशसमुत्थानां गीतानां योऽभवत् स्वनः ॥ २० ॥
वादित्रनादितानां च सोऽद्य न श्रूयते महान् ।
नाना प्रदेशोंसे आये हुए लोगोंके गाये हुए गीतोंका और बजाये हुए बाजोंका भी जो महान् शब्द श्रवण-गोचर होता था, वह अब नहीं सुनायी देता है ॥ २० १/२ ॥
यदा प्रभृत्युपप्लव्याच्छान्तिमिच्छञ्जनार्दनः ॥ २१ ॥
आगतः सर्वभूतानामनुकम्पार्थमच्युतः ।
ततोऽहमब्रुवं सूत मन्दं दुर्योधनं तदा ॥ २२ ॥
संजय! जब अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये शान्ति स्थापित करनेकी इच्छा लेकर उपप्लव्यसे