भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भयात् ॥ ५१ ॥ **देवता बोले—**देवप्रवर! सुरश्रेष्ठ! वृत्रासुरने जिन्हें सब प्रकारसे कुचल दिया है, उन देवताओंके लिये आप आश्रयदाता हों। महान् भयसे हमारी रक्षा करें ॥ अथ पार्श्वे स्थितं विष्णुं शक्रादींश्च सुरोत्तमान् । प्राह तथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान् सुरसत्तमान् ॥ ५२ ॥ तब अपने पास खड़े हुए भगवान् विष्णु तथा विषादमें भरे हुए इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंसे ब्रह्माजीने यह यथार्थ बात कही— ॥ ५२ ॥ रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्द्विजातयः । त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ॥ ५३ ॥ ‘देवताओ! इन्द्र आदि देवता और ब्राह्मण सदा ही मेरे रक्षणीय हैं। परंतु वृत्रासुरका जिससे निर्माण हुआ है, वह त्वष्टा प्रजापतिका अत्यन्त दुर्धर्ष तेज है ॥ ५३ ॥ त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षायुतशतं तदा । वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ॥ ५४ ॥ ‘देवगण! प्राचीन कालमें त्वष्टा प्रजापतिने दस लाख वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् शंकरसे वरदान पाकर वृत्रासुरको उत्पन्न किया था ॥ ५४ ॥ स तस्यैव प्रसादाद् वो हन्यादेव रिपुर्बली । नागत्वा शंकरस्थानं भगवान् दृश्यते हरः ॥ ५५ ॥ ‘वह बलवान् शत्रु भगवान् शंकरके ही प्रसादसे निश्चय ही तुम सब लोगोंको मार सकता है। अतः भगवान् शंकरके निवासस्थानपर गये बिना उनका दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥ दृष्ट्वा जेष्यथ वृत्रं तं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् । यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षयज्ञविनाशनः ॥ ५६ ॥ पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः । ‘उनका दर्शन पाकर तुमलोग वृत्रासुरको जीत सकोगे। अतः शीघ्र ही मन्दराचलको चलो, जहाँ तपस्याके उत्पत्तिस्थान, दक्षयज्ञविनाशक तथा भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले सर्वभूतेश्वर पिनाकधारी भगवान् शिव विराजमान हैं’ ॥ ५६ १/२ ॥ ते गत्वा सहिता देवा ब्रह्मणा सह मन्दरम् ॥ ५७ ॥ अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् । ‘तब एकत्र हुए उन सब देवताओंने ब्रह्माजीके साथ मन्दराचलपर जाकर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजोरराशि भगवान् शिवका दर्शन किया ॥ ५७ १/२ ॥ सोऽब्रवीत् स्वागतं देवा ब्रुत किं करवाण्यहम् ॥ ५८ ॥ अमोघं दर्शनं मह्यं कामप्राप्तिरतोऽस्तु वः ।