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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

उस समय भगवान् शिवने कहा—‘देवताओ! तुम्हारा स्वागत है। बोलो, मैं तुम्हारे लिये

क्या करूँ? मेरा दर्शन अमोघ है। अतः तुम्हें अपने अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति हो' ।।

एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसः ।। ५९ ।।

तेजो हृतं नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम् ।

मूर्तीरीक्षस्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः ।

शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ।। ६० ।।

उनके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवता इस प्रकार बोले—‘देव! वृत्रासुरने हमारा तेज हर

लिया है। आप देवताओंके आश्रयदाता हों। महेश्वर! आप हमारे शरीरोंकी दशा देखिये। हम

वृत्रासुरके प्रहारोंसे जर्जर हो गये हैं, इसलिये आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें आश्रय

दीजिये' ।। ५९-६० ।।

शर्व उवाच

विदितं वो यथा देवाः कृत्येयं सुमहाबला ।

त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याकृतात्मभिः ।। ६१ ।।

भगवान् शिव बोले—देवताओ! तुम्हें विदित हो कि यह प्रजापति त्वष्टाके तेजसे

उत्पन्न हुई अत्यन्त प्रबल एवं भयंकर कृत्या है। जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें

नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये इस कृत्याका निवारण करना अत्यन्त कठिन है ।। ६१ ।।

अवश्यं तु मया कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् ।

ममेदं गात्रजं शक्र कवचं गृह्य भास्वरम् ।। ६२ ।।

तथापि मुझे सम्पूर्ण देवताओंकी सहायता अवश्य करनी चाहिये। अतः इन्द्र! मेरे

शरीरसे उत्पन्न हुए इस तेजस्वी कवचको ग्रहण करो ।। ६२ ।।

बधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर ।

वधायासुरमुख्यस्य वृत्रस्य सुरघातिनः ।। ६३ ।।

सुरेश्वर! मेरे बताये हुए इस मन्त्रका मानसिक जप करके असुरमुख्य देवशत्रु वृत्रका

वध करनेके लिये इसे अपने शरीरमें बाँध लो ।। ६३ ।।

द्रोण उवाच

इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद् वर्म तन्मन्त्रमेव च ।

स तेन वर्मणा गुप्तः प्रायाद् वृत्रचमूं प्रति ।। ६४ ।।

द्रोणाचार्य कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर वरदायक भगवान् शंकरने वह कवच और

उसका मन्त्र उन्हें दे दिया। उस कवचसे सुरक्षित हो इन्द्र वृत्रासुरकी सेनाका सामना करनेके

लिये गये ।। ६४ ।।

नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे ।

न संधिः शक्यते भेत्तुं वर्मबन्धस्य तस्य तु ।। ६५ ।।