भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 715

अर्जुनकुमार श्रुतकीर्तिने अत्यन्त कुपित हो चार तीखे बाणोंद्वारा शलके चारों घोड़ोंको यमलोक भेज दिया ॥ ७ ॥ भैमसेनिर्धनुश्छित्त्वा सौमदत्तेर्महात्मनः । ननाद बलवन्नादं विव्याध च शितैः शरैः ॥ ८ ॥ फिर भीमसेनके पुत्र सुतसोमने पैने बाणोंद्वारा महामना सोमदत्तकुमारके धनुषको काटकर उन्हें भी बींध डाला और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ८ ॥ यौधिष्ठिरिर्ध्वजं तस्य छित्त्वा भूमावपातयत् । नाकुलिश्चाथ यन्तारं रथनीडादपाहरत् ॥ ९ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरकुमार प्रतिविन्ध्यने शलकी ध्वजा काटकर पृथ्वीपर गिरा दी। फिर नकुलपुत्र शतानीकने उनके सारथिको मारकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ९ ॥ साहदेविस्तु तं ज्ञात्वा भ्रातृभिर्विमुखीकृतम् । क्षुरप्रेण शिरो राजन् निचकर्त महात्मनः ॥ १० ॥ राजन्! अन्तमें सहदेवकुमारने यह जानकर कि मेरे भाइयोंनै शलको युद्धसे विमुख कर दिया है, महामनस्वी शलके मस्तकको क्षुरप्रसे काट डाला ॥ १० ॥ तच्छिरो न्यपतद् भूमौ तपनीयविभूषितम् । भ्राजयत् तं रणोद्देशं बालसूर्यसमप्रभम् ॥ ११ ॥ सोमदत्तकुमारका प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशमान सुवर्णभूषित वह मस्तक उस रणभूमिको प्रकाशित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥ सौमदत्तेः शिरो दृष्ट्वा निहतं तन्महात्मनः । वित्रस्तास्तावका राजन् प्रदुद्रुवुरनेकधा ॥ १२ ॥ महाराज! महामना शलके मस्तकको कटा हुआ देख आपके सैनिक अत्यन्त भयभीत हो अनेक दलोंमें बँटकर भागने लगे ॥ १२ ॥ अलम्बुषस्तु समरे भीमसेनं महाबलम् । योधयामास संक्रुद्धो लक्ष्मणं रावणिर्यथा ॥ १३ ॥ तदनन्तर जैसे पूर्वकालमें रावणकुमार मेघनादने लक्ष्मणके साथ युद्ध किया था, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए राक्षस अलम्बुषने महाबली भीमसेनके साथ संग्राम आरम्भ किया ॥ १३ ॥ सम्प्रयुद्धौ रणे दृष्ट्वा तावुभौ नरराक्षसौ । विस्मयः सर्वभूतानां प्रहर्षः समजायत ॥ १४ ॥ उस रणक्षेत्रमें उन दोनों मनुष्य एवं राक्षसको युद्ध करते देख समस्त प्राणियोंको अत्यन्त आश्चर्य और हर्ष हुआ ॥ १४ ॥ आर्ष्यशृङ्गिं ततो भीमो नवभिर्निशितैः शरैः । विव्याध प्रहसन् राजन् राक्षसेन्द्रममर्षणम् ॥ १५ ॥