महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंबको नाम सुदुर्बुद्धे राक्षसप्रवरो बली । परोक्षं मम तद् वृत्तं यद् भ्राता मे हतस्त्वया ॥ २४ ॥ ‘पार्थ! इस समय तुम रणक्षेत्रमें डटे रहो और आज मेरा पराक्रम देखो। दुर्मते! मेरे बलवान् भाई राक्षसराज बकको जो तुमने मार डाला था, वह सब कुछ मेरी आँखोंकी ओटमें हुआ था (मेरे सामने तुम कुछ नहीं कर सकते थे)’॥ २३-२४ ॥ एवमुक्त्वा ततो भीममन्तर्धानं गतस्तदा । महता शरवर्षेण भृशं तं समवाकिरत् ॥ २५ ॥ भीमसेनसे ऐसा कहकर वह राक्षस उसी समय अन्तर्धान हो गया और फिर उनके ऊपर बाणोंकी भारी वर्षा करने लगा ॥ २५ ॥ भीमस्तु समरे राजन्नदृश्ये राक्षसे तदा । आकाशं पूरयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ २६ ॥ राजन्! उस समय समरांगणमें राक्षसके अदृश्य हो जानेपर भीमसेनने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा वहाँके समूचे आकाशको भर दिया ॥ २६ ॥ स वध्यमानो भीमेन निमेषाद् रथमास्थितः । जगाम धरणीं चैव क्षुद्रः खं सहसागमत् ॥ २७ ॥ भीमसेनके बाणोंकी मार खाकर राक्षस अलम्बुष पलक मारते-मारते अपने रथपर आ बैठा। वह क्षुद्र निशाचर कभी तो धरतीपर आ जाता और कभी सहसा आकाशमें पहुँच जाता था ॥ २७ ॥ उच्चावचानि रूपाणि चकार सुबहूनि च । अणुर्बृहत् पुनः स्थूलो नादान् मुञ्चन्निवाम्बुदः ॥ २८ ॥ उसने वहाँ छोटे-बड़े बहुत-से रूप धारण किये। वह मेघके समान गर्जना करता हुआ कभी बहुत छोटा हो जाता और कभी महान्, कभी सूक्ष्मरूप धारण करता और कभी स्थूल बन जाता था ॥ २८ ॥ उच्चावचास्तथा वाचो व्याजहार समन्ततः । निपेतुर्गगनाच्चैव शरधाराः सहस्रशः ॥ २९ ॥ इसी प्रकार वहाँ सब ओर घूम-घूमकर वह भिन्न-भिन्न प्रकारकी बोलियाँ भी बोलता था। उस समय भीमसेनपर आकाशसे बाणोंकी सहस्रों धाराएँ गिरने लगीं ॥ शक्तयः कणपाः प्रासाः शूलपट्टिशतोमराः । शतघ्न्यः परिघाश्चैव भिन्दिपालाः परश्वधाः ॥ ३० ॥ शिलाः खड्गा गुडाश्चैव ऋष्टीर्वज्राणि चैव ह । सा राक्षसविसृष्टा तु शस्त्रवृष्टिः सुदारुणा ॥ ३१ ॥ जघान पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् रणमूर्धनि ।