भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 751

'महाराज! जिन दूसरे इन सात सौ हाथियोंको आप देख रहे हैं, जो कवचसे आच्छादित हैं और जिनपर किरात योद्धा चढ़े हुए हैं, ये वे ही हाथी हैं, जिन्हें दिग्विजयके समय अपने प्राण बचानेकी इच्छा रखकर किरातराजने सव्यसाची अर्जुनको भेंट किया था। ये सजे-सजाये हाथी उन दिनों आपके सेवक थे ।। २७-२८ १/२ ।। आसन्नेते पुरा राजंस्तव कर्मकरा दृढम् ।। २९ ।। त्वामेवाद्य युयुत्सन्ते पश्य कालस्य पर्ययम् । 'महाराज! यह कालचक्रका परिवर्तन तो देखिये—जो पूर्वकालमें दृढ़तापूर्वक आपकी सेवा करनेवाले थे, वे आज आपसे ही युद्ध करना चाहते हैं ।। २९ १/२ ।। एषामेते महामात्राः किराता युद्धदुर्मदाः ।। ३० ।। हस्तिशिक्षाविदश्चैव सर्वे चैवाग्नियोनयः । एते विनिर्जिताः संख्ये संग्रामे सव्यसाचिना ।। ३१ ।। 'ये रणदुर्मद किरात इन हाथियोंके महावत और इन्हें शिक्षा देनेमें कुशल हैं। ये सब-के-सब अग्निसे उत्पन्न हुए हैं। सव्यसाची अर्जुनने इन सबको संग्रामभूमिमें पराजित कर दिया था ।। ३०-३१ ।। मदर्थमद्य संयत्ता दुर्योधनवशानुगाः । एतान् हत्वा शरै राजन् किरातान् युद्धदुर्मदान् ।। ३२ ।। सैन्धवस्य वधे यत्तमनुयास्यामि पाण्डवम् । 'राजन्! आज दुर्योधनके वशीभूत होकर ये मेरे साथ युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं। इन रणदुर्मद किरातोंका अपने बाणोंद्वारा संहार करके मैं सिंधुराजके वधके प्रयत्नमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनके पास जाऊँगा ।। ३२ १/२ ।। ये त्वेते सुमहानागा अञ्जनस्य कुलोद्भवाः ।। ३३ ।। कर्कशाश्च विनीताश्च प्रभिन्नकरटामुखाः । जाम्बूनदमयैः सर्वै वर्मभिः सुविभूषिताः ।। ३४ ।। लब्धलक्ष्या रणे राजन्नैरावणसमा युधि । उत्तरात् पर्वतादेते तीक्ष्णैर्दस्युभिरास्थिताः ।। ३५ ।। 'ये जो बड़े-बड़े गजराज दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये अंजन नामक दिग्गजके कुलमें उत्पन्न हुए हैं*-। इनका स्वभाव बड़ा ही कठोर है। इन्हें युद्धकी अच्छी शिक्षा मिली है। इनके गण्डस्थल और मुखसे मदकी धारा बहती रहती है। वे सब-के-सब सुवर्णमय कवचोंसे विभूषित हैं। राजन्! ये पहले भी युद्धस्थलमें अपने लक्ष्यपर विजय पा चुके हैं और समरांगणमें ऐरावतके समान पराक्रम