महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 752, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकट करते हैं। उत्तर पर्वत (हिमालय-प्रदेश)-से आये हुए तीखे स्वभाववाले लुटेरे और डाकू इन हाथियोंपर सवार हैं॥ ३३—३५॥
कर्कशैः प्रवरैर्योधैः कार्ष्णायसतनुच्छदैः।
सन्ति गोयोनयश्चात्र सन्ति वानरयोनयः॥ ३६॥
अनेकयोनयश्चान्ये तथा मानुषयोनयः।
'वे कर्कश स्वभाववाले तथा श्रेष्ठ योद्धा हैं। उन्होंने काले लोहेके बने हुए कवच धारण कर रखे हैं। उनमेंसे बहुत-से दस्यु गायोंके पेटसे उत्पन्न हुए हैं। कितने ही बंदरियोंकी संतानें हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें अनेक योनियोंका सम्मिश्रण है तथा कितने ही मानव-संतान भी हैं॥ ३६ १/२॥
अनीकं समवेतानां धूम्रवर्णमुदीर्यते॥ ३७॥
म्लेच्छानां पापकर्तृणां हिमदुर्गनिवासिनाम्।
'यहाँ एकत्र हुए हिमदुर्गनिवासी पापाचारी म्लेच्छोंकी यह सेना धूएँके समान काली प्रतीत होती है॥ ३७ १/२॥
एतद् दुर्योधनो लब्ध्वा समग्रं राजमण्डलम्॥ ३८॥
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम्।
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान्॥ ३९॥
कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदितः।
'कालसे प्रेरित हुआ दुर्योधन इन समस्त राजाओंके समुदायको तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, जयद्रथ और कर्णको पाकर पाण्डवोंका अपमान करता है तथा अपने-आपको कृतार्थ मान रहा है॥ ३८-३९ १/२॥
ते तु सर्वेऽद्य सम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम्॥ ४०॥
न विमोक्ष्यन्ति कौन्तेय यद्यपि स्युर्मनोजवाः।
'कुन्तीनन्दन! वे सब लोग आज मेरे नाराचोंके लक्ष्य बने हुए हैं। वे मनके समान वेगशाली हों तो भी मेरे हाथोंसे छूट नहीं सकेंगे॥ ४० १/२॥
तेन सम्भाविता नित्यं परवीर्योपजीविना॥ ४१॥
विनाशमुपयास्यन्ति मच्छ्रौघनिपीडिताः।
'दूसरोंके बलपर जीनेवाले दुर्योधनने इन सब लोगोंका सदा आदरपूर्वक भरण-पोषण किया है; परंतु ये मेरे बाणसमूहोंसे पीड़ित होकर आज विनष्ट हो जायँगे॥ ४१ १/२॥
ये त्वेते रथिनो राजन् दृश्यन्ते काञ्चनध्वजाः॥ ४२॥
एते दुर्वारणा नाम काम्बोजा यदि ते श्रुताः।