भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

प्रकट करते हैं। उत्तर पर्वत (हिमालय-प्रदेश)-से आये हुए तीखे स्वभाववाले लुटेरे और डाकू इन हाथियोंपर सवार हैं॥ ३३—३५॥

कर्कशैः प्रवरैर्योधैः कार्ष्णायसतनुच्छदैः।
सन्ति गोयोनयश्चात्र सन्ति वानरयोनयः॥ ३६॥
अनेकयोनयश्चान्ये तथा मानुषयोनयः।
'वे कर्कश स्वभाववाले तथा श्रेष्ठ योद्धा हैं। उन्होंने काले लोहेके बने हुए कवच धारण कर रखे हैं। उनमेंसे बहुत-से दस्यु गायोंके पेटसे उत्पन्न हुए हैं। कितने ही बंदरियोंकी संतानें हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें अनेक योनियोंका सम्मिश्रण है तथा कितने ही मानव-संतान भी हैं॥ ३६ १/२॥

अनीकं समवेतानां धूम्रवर्णमुदीर्यते॥ ३७॥
म्लेच्छानां पापकर्तृणां हिमदुर्गनिवासिनाम्।
'यहाँ एकत्र हुए हिमदुर्गनिवासी पापाचारी म्लेच्छोंकी यह सेना धूएँके समान काली प्रतीत होती है॥ ३७ १/२॥

एतद् दुर्योधनो लब्ध्वा समग्रं राजमण्डलम्॥ ३८॥
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम्।
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान्॥ ३९॥
कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदितः।
'कालसे प्रेरित हुआ दुर्योधन इन समस्त राजाओंके समुदायको तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, जयद्रथ और कर्णको पाकर पाण्डवोंका अपमान करता है तथा अपने-आपको कृतार्थ मान रहा है॥ ३८-३९ १/२॥

ते तु सर्वेऽद्य सम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम्॥ ४०॥
न विमोक्ष्यन्ति कौन्तेय यद्यपि स्युर्मनोजवाः।
'कुन्तीनन्दन! वे सब लोग आज मेरे नाराचोंके लक्ष्य बने हुए हैं। वे मनके समान वेगशाली हों तो भी मेरे हाथोंसे छूट नहीं सकेंगे॥ ४० १/२॥

तेन सम्भाविता नित्यं परवीर्योपजीविना॥ ४१॥
विनाशमुपयास्यन्ति मच्छ्रौघनिपीडिताः।
'दूसरोंके बलपर जीनेवाले दुर्योधनने इन सब लोगोंका सदा आदरपूर्वक भरण-पोषण किया है; परंतु ये मेरे बाणसमूहोंसे पीड़ित होकर आज विनष्ट हो जायँगे॥ ४१ १/२॥

ये त्वेते रथिनो राजन् दृश्यन्ते काञ्चनध्वजाः॥ ४२॥
एते दुर्वारणा नाम काम्बोजा यदि ते श्रुताः।

'राजन्! ये जो सोनेकी ध्वजावाले रथी दिखायी देते हैं, ये दुर्वारण नामवाले काम्बोज सैनिक हैं। आपने इनका नाम सुना होगा ॥ ४२ १/२ ॥
शूराश्च कृतविद्याश्च धनुर्वेदे च निष्ठिताः ॥ ४३ ॥
संहताश्च भृशं ह्येते अन्योन्यस्य हितैषिणः ।
'ये शूर, विद्वान् तथा धनुर्वेदमें परिनिष्ठित हैं। इनमें परस्पर बड़ा संगठन है। ये एक-दूसरेका हित चाहनेवाले हैं ॥ ४३ १/२ ॥
अक्षौहिण्यश्च संरब्धा धार्तराष्ट्रस्य भारत ॥ ४४ ॥
यत्ता मदर्थे तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिताः ।
अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिताः ॥ ४५ ॥
'भरतनन्दन! दुर्योधनकी क्रोधमें भरी हुई ये कई अक्षौहिणी सेनाएँ कौरववीरोंसे सुरक्षित हो मेरे लिये तैयार खड़ी हैं। महाराज! ये सब सावधान होकर मुझपर ही आक्रमण करनेवाली हैं ॥ ४४-४५ ॥
तानहं प्रमथिष्यामि तृणानीव हुताशनः ।
तस्मात् सर्वानुपासंगान् सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥
रथे कुर्वन्तु मे राजन् यथावद् रथकल्पकाः ।
'परंतु जैसे आग तिनकोंको जला डालती है, उसी प्रकार मैं उन समस्त कौरव-सैनिकोंको मथ डालूँगा। अतः राजन्! रथको सुसज्जित करनेवाले लोग आज मेरे रथपर यथावत् रूपसे भरे हुए तरकसों तथा अन्य सब आवश्यक उपकरणोंको रख दें ॥ ४६ १/२ ॥
अस्मिंस्तु किल सम्मर्दे ग्राह्यं विविधमायुधम् ॥ ४७ ॥
यथोपदिष्टमाचार्यैः कार्यः पञ्चगुणो रथः ।
'इस संग्राममें नाना प्रकारके आयुधोंका उसी प्रकार संग्रह कर लेना चाहिये, जैसा कि आचार्योंने उपदेश किया है। रथपर रखी जानेवाली युद्धसामग्री पहलेसे पाँचगुनी कर देनी चाहिये ॥ ४७ १/२ ॥
काम्बोजैर्हि समेष्यामि तीक्ष्णैराशीविषोपमैः ॥ ४८ ॥
नानाशस्त्रसमावायैर्विविधायुधयोधिभिः ।
'आज मैं विषधर सर्पके समान क्रूर स्वभाववाले उन काम्बोज-सैनिकोंके साथ युद्ध करूँगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रसमुदायोंसे सम्पन्न और भाँति-भाँतिके आयुधोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल हैं ॥ ४८ १/२ ॥
किरातैश्च समेष्यामि विषकल्पैः प्रहारिभिः ॥ ४९ ॥
लालितैः सततं राज्ञा दुर्योधनहितैषिभिः ।

'दुर्योधनका हित चाहनेवाले और विषके समान घातक उन प्रहारकुशल किरात-योद्धाओंके साथ भी संग्राम करूँगा, जिनका राजा दुर्योधनने सदा ही लालन-पालन किया है ।। ४९ १/२ ।। शकैश्चापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमैः ।। ५० ।। अग्निकल्पैर्दुराधर्षैः प्रदीप्तैरिव पावकैः । 'प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष एवं इन्द्रके समान पराक्रमी शकोंके साथ भी आज मैं भिड़ जाऊँगा ।। ५० १/२ ।। तथान्यैर्विविधैर्योधैः कालकल्पैर्दुरासदैः ।। ५१ ।। समेष्यामि रणे राजन् बहुभिर्युद्धदुर्मदैः । 'राजन्! इनके सिवा और भी जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक युद्धदुर्मद, कालके तुल्य भयंकर तथा दुर्जय योद्धा हैं, रणक्षेत्रमें उन सबका सामना करूँगा ।। ५१ १/२ ।। तस्माद् वै वाजिनो मुख्या विश्रान्ताः शुभलक्षणाः ।। ५२ ।। उपावृत्ताश्च पीताश्च पुनर्युज्यन्तु मे रथे । 'इसलिये उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ घोड़े, जो विश्राम कर चुके हों, जिन्हें टहलाया गया हो और पानी भी पिला दिया गया हो, पुनः मेरे रथमें जोते जायँ' ।। ५२ १/२ ।।

संजय उवाच

तस्य सर्वानुपासांगान् सर्वोपकरणानि च ।। ५३ ।। रथे चास्थापयद् राजा शस्त्राणि विविधानि च । **संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने सात्यकिके रथपर भरे हुए तरकसों, समस्त उपकरणों तथा भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको रखवा दिया ।। ५३ १/२ ।। ततस्तान् सर्वतो युक्तान् सदश्वांश्चतुरो जनाः ।। ५४ ।। रसवत् पाययामासुः पानं मदसमीरणम् । तदनन्तर सब प्रकारसे सुशिक्षित उन चारों उत्तम घोड़ोंको सेवकोंने मदमत्त बना देनेवाला रसीला पेय पदार्थ पिलाया ।। ५४ १/२ ।। पीतोपवृत्तान् स्नातांश्च जग्धान्नान् समलंकृतान् ।। ५५ ।। विनीतशल्यांस्तुरगांश्चतुरो हेममालिनः । तान् युक्तान् रुक्मवर्णाभान् विनीतान् शीघ्रगामिनः ।। ५६ ।। संहृष्टमनसोऽव्यग्रान् विधिवत्कल्पितान् रथे । महाध्वजेन सिंहेन हेमकेसरमालिना ।। ५७ ।।

संवृते केतकैर्हैमैर्मणिविद्रुमचित्रितैः । पाण्डुराभ्रप्रकाशाभिः पताकाभिरलंकृते ॥ ५८ ॥ हेमदण्डोच्छ्रितच्छत्रे बहुशस्त्रपरिच्छदे । योजयामास विधिवद्धेमभाण्डविभूषितान् ॥ ५९ ॥ जब वे पी चुके तो उन्हें टहलाया और नहलाया गया। उसके बाद दाना और चारा खिलाया गया। फिर उन्हें सब प्रकारसे सुसज्जित किया गया। उनके अंगोंमें गड़े हुए बाण पहले ही निकाल दिये गये थे। वे चारों घोड़े सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे। उन योग्य अश्वोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सुशिक्षित और शीघ्रगामी थे। उनके मनमें हर्ष और उत्साह था। तनिक भी व्यग्रता नहीं थी। उन्हें विधिपूर्वक सजाया गया था। स्वर्णमय अलंकारोंसे अलंकृत उन अश्वोंको सारथिने विधिपूर्वक रथमें जोता। वह रथ सुवर्णमय केशरोंसे सुशोभित सिंहके चिह्नवाले विशाल ध्वजसे सम्पन्न था। मणियों और मूँगोंसे चित्रित सोनेकी शलाकाओंसे शोभायमान एवं श्वेत पताकाओंसे अलंकृत था। उस रथके ऊपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित छत्र तना हुआ था तथा रथके भीतर नाना प्रकारके शस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामान रखे गये थे ॥ ५५—५९ ॥

दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रियः सखा । न्यवेदयद् रथं युक्तं वासवस्येव मातलिः ॥ ६० ॥ जैसे मातलि इन्द्रका सारथि और सखा भी है, उसी प्रकार दारुकका छोटा भाई सात्यकिका सारथि और प्रिय सखा था। उसने सात्यकिको यह सूचना दी कि रथ जोतकर तैयार है ॥ ६० ॥

ततः स्नातः शुचिर्भूत्वा कृतकौतुकमङ्गलः । स्नातकानां सहस्रस्य स्वर्णनिष्कानथो ददौ ॥ ६१ ॥ तदनन्तर सात्यकिने स्नान करके पवित्र हो यात्राकालिक मंगलकृत्य सम्पन्न करनेके पश्चात् एक सहस्र स्नातकोंको सोनेकी मुद्राएँ दान कीं ॥ ६१ ॥

आशीर्वादैः परिष्वक्तः सात्यकिः श्रीमतां वरः । ततः स मधुपर्कार्हः पीत्वा कैलातकं मधु ॥ ६२ ॥ लोहिताक्षो बभौ तत्र मदविह्वललोचनः । आलभ्य वीरकांस्यं च हर्षेण महतान्वितः ॥ ६३ ॥ द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावकः । उत्सङ्गे धनुरादाय सशरं रथिनां वरः ॥ ६४ ॥ कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः कवची समलंकृतः । लाजैर्गन्धैस्तथा माल्यैः कन्याभिश्चाभिनन्दितः ॥ ६५ ॥

ब्राह्मणोंके आशीर्वाद पाकर तेजस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं मधुपर्कके अधिकारी

सात्यकिने कैलातक नामक मधुका पान किया। उसे पीते ही उनकी आँखें लाल

हो गयीं। मदसे नेत्र चंचल हो उठे, फिर उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर

वीरकांस्यपात्रका स्पर्श किया। उस समय प्रज्वलित अग्निके समान रथियोंमें

श्रेष्ठ सात्यकिका तेज दूना हो गया। उन्होंने बाणसहित धनुषको गोदमें लेकर

ब्राह्मणोंके मुखसे स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न कराकर कवच एवं आभूषण

धारण किये, फिर कुमारी कन्याओंने लावा, गन्ध तथा पुष्पमालाओंसे उनका

पूजन एवं अभिनन्दन किया ।। ६२—६५ ।।

युधिष्ठिरस्य चरणावभिवाद्य कृताञ्जलिः ।

तेन मूर्ध्न्युपाघ्रात आरुरोह महारथम् ।। ६६ ।।

इसके बाद सात्यकिने हाथ जोड़कर युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम किया और

युधिष्ठिरने उनका मस्तक सूँघा। फिर वे उस विशाल रथपर आरूढ़ हो

गये ।। ६६ ।।

ततस्ते वाजिनो हृष्टाः सुपुष्टाः वातरंहसः ।

अजय्या जैत्रमूहूस्तं विकुर्वाणाः स्म सैन्धवाः ।। ६७ ।।

तदनन्तर वे हृष्ट-पुष्ट वायुके समान वेगशाली एवं अजेय सिंधुदेशीय घोड़े

मदमत्त हो उस विजयशील रथको लेकर चल दिये ।। ६७ ।।

तथैव भीमसेनोऽपि धर्मराजेन पूजितः ।

प्रायात् सात्यकिना सार्धमभिवाद्य युधिष्ठिरम् ।। ६८ ।।

इसी प्रकार धर्मराजसे सम्मानित भीमसेन भी युधिष्ठिरको प्रणाम करके

सात्यकिके साथ चले ।। ६८ ।।

तौ दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तौ तव सेनामरिंदमौ ।

संयत्तास्तावकाः सर्वे तस्थुर्द्रोणपुरोगमाः ।। ६९ ।।

उन दोनों शत्रुदमन वीरोंको आपकी सेनामें प्रवेश करनेके लिये इच्छुक देख

द्रोणाचार्य आदि आपके सारे सैनिक सावधान होकर खड़े हो गये ।। ६९ ।।

संनद्धमनुगच्छन्तं दृष्ट्वा भीमं स सात्यकिः ।

अभिनन्द्याब्रवीद् वीरस्तदा हर्षकरं वचः ।। ७० ।।

उस समय भीमसेनको कवच आदिसे सुसज्जित होकर अपने पीछे आते

देख उनका अभिनन्दन करके वीर सात्यकिने उनसे यह हर्षवर्धक वचन कहा

— ।। ७० ।।

त्वं भीम रक्ष राजानमेतत् कार्यतमं हि ते ।

अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं बलम् ।। ७१ ।।

'भीमसेन! तुम राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो। यही तुम्हारे लिये सबसे महान् कार्य है। जिसे कालने राँधकर पका दिया है, इस कौरव-सेनाको चीरकर मैं भीतर प्रवेश कर जाऊँगा ।। ७१ ।।
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो राज्ञोऽभिरक्षणम् ।
जानीषे मम वीर्यं त्वं तव चाहमरिंदम ।। ७२ ।।
तस्माद् भीम निवर्तस्व मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
'शत्रुदमन वीर! इस समय और भविष्यमें भी राजाकी रक्षा करना ही श्रेयस्कर है। तुम मेरा बल जानते हो और मैं तुम्हारा। अतः भीमसेन! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो लौट जाओ ।। ७२ १/२ ।।
तथोक्तः सात्यकिं प्राह व्रज त्वं कार्यसिद्धये ।। ७३ ।।
अहं राज्ञः करिष्यामि रक्षां पुरुषसत्तम ।
सात्यकिके ऐसा कहनेपर भीमसेनने उनसे कहा—'अच्छा भैया! तुम कार्यसिद्धिके लिये आगे बढ़ो। पुरुषप्रवर! मैं राजाकी रक्षा करूँगा' ।। ७३ १/२ ।।
एवमुक्तः प्रत्युवाच भीमसेनं स माधवः ।। ७४ ।।
गच्छ गच्छ ध्रुवं पार्थ ध्रुवो हि विजयो मम ।
भीमसेनके ऐसा कहनेपर सात्यकिने उनसे कहा—'कुन्तीकुमार! तुम जाओ। निश्चय ही लौट जाओ। मेरी विजय अवश्य होगी ।। ७४ १/२ ।।
यन्मे गुणानुरक्तश्च त्वमद्य वशमास्थितः ।। ७५ ।।
निमित्तानि च धन्यानि यथा भीम वदन्ति माम् ।
निहते सैन्धवे पापे पाण्डवेन महात्मना ।। ७६ ।।
परिष्वजिष्ये राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
'भीमसेन! तुम जो मेरे गुणोंमें अनुरक्त होकर मेरे वशमें हो गये हो तथा इस समय दिखायी देनेवाले शुभ शकुन मुझे जैसी बात बता रहे हैं, इससे जान पड़ता है कि महात्मा अर्जुनके द्वारा पापी जयद्रथके मारे जानेपर मैं निश्चय ही लौटकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका आलिंगन करूँगा' ।। ७५-७६ १/२ ।।
एतावदुक्त्वा भीमं तु विसृज्य च महायशाः ।। ७७ ।।
सम्प्रैक्षत् तावकं सैन्यं व्याघ्रो मृगगणानिव ।
भीमसेनसे ऐसा कहकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् महायशस्वी सात्यकिने आपकी सेनाकी ओर उसी प्रकार देखा, जैसे बाघ मृगोंके झुंडकी ओर देखता है ।। ७७ १/२ ।।
तं दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तं सैन्यं तव जनाधिप ।। ७८ ।।
भूय एवाभवन्मूढं सुभृशं चाप्यकम्पत ।

नरेश्वर! सात्यकिको अपने भीतर प्रवेश करनेके लिये उत्सुक देख आपकी सेनापर पुनः मोह छा गया और वह बारंबार काँपने लगी ।। ७८ १/२ ।।
ततः प्रयात: सहसा तव सैन्यं स सात्यकिः ।। ७९ ।।
दिदृक्षुरर्जुनं राजन् धर्मराजस्य शासनात् ।
राजन्! तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञाके अनुसार अर्जुनसे मिलनेके लिये सात्यकि आपकी सेनाकी ओर वेगपूर्वक बढ़े ।। ७९ १/२ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेशविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११२ ।।


* अंजनके कुलमें उत्पन्न हुए हाथियोंका लक्षण इस प्रकार बतलाया गया है—
स्निग्धनीलाम्बुदप्रख्या बलिनो विपुलैः करैः । सुविभक्तमहाशीर्षाः
करिणोऽञ्जनवंशजाः ।।
‘स्निग्ध एवं नील-वर्णके मेघोंकी घटाके समान काले, बलवान्, विशाल शुण्डदण्डसे सुशोभित तथा सुन्दर विभागयुक्त विशाल मस्तकवाले हाथी अंजनकुलकी संतानें हैं।’

११३-

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना

संजय उवाच

प्रयाते तव सैन्यं तु युयुधाने युयुत्सया ।
धर्मराजो महाराज स्वेनानीकेन संवृतः ॥ १ ॥
प्रायाद् द्रोणरथं प्रेप्सुर्युयुधानस्य पृष्ठतः ।
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब युयुधान युद्धकी इच्छासे आपकी सेनाकी ओर बढ़े, उस समय अपने सैनिकोंसे घिरे हुए धर्मराज युधिष्ठिर द्रोणाचार्यके रथका सामना करनेके लिये उनके पीछे-पीछे गये ॥ १ १/२ ॥

ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः समरदुर्मदः ॥ २ ॥
प्राक्रोशत् पाण्डवानीके वसुदानश्च पार्थिवः ।
आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत ॥ ३ ॥
यथा सुखेन गच्छेत सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
महारथा हि बहवो यतिष्यन्त्यस्य निर्जये ॥ ४ ॥
तदनन्तर समरभूमिमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न तथा राजा वसुदानने पाण्डवसेनामें पुकारकर कहा—'योद्धाओ! आओ, दौड़ो और शीघ्रतापूर्वक प्रहार करो, जिससे रणदुर्मद सात्यकि सुखपूर्वक आगे जा सकें; क्योंकि बहुत-से कौरव महारथी इन्हें पराजित करनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २—४ ॥

इति ब्रुवन्तो वेगेन निपेतुस्ते महारथाः ।
वयं प्रतिजिगीषन्तस्तत्र तान् समभिद्रुताः ॥ ५ ॥
सेनापतिकी पूर्वोक्त बात दोहराते हुए सभी पाण्डव महारथी बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचे। उस समय हमलोगोंंने भी उन्हें जीतनेकी अभिलाषासे उनपर धावा कर दिया ॥ ५ ॥

(बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शङ्खनिस्वनैः ।
युयुधानरथं दृष्ट्वा तावका अभिदुद्रुवुः ॥)
युयुधानके रथको देखकर आपके सैनिक शंखध्वनिसे मिश्रित बाणोंका शब्द प्रकट करते हुए उनके सामने दौड़े आये ॥

ततः शब्दो महानासीद् युयुधानरथं प्रति ।
आकीर्यमाणा धावन्ती तव पुत्रस्य वाहिनी ॥ ६ ॥
सात्वतेन महाराज शतधाभिव्यशीर्यत ।

तदनन्तर सात्यकिके रथके समीप महान् कोलाहल मच गया। महाराज! चारों ओरसे दौड़कर आती हुई आपके पुत्रकी सेना सात्यकिके बाणोंसे आच्छादित हो सैकड़ों टुकड़ियोंमें बँटकर तितत-बितर हो गयी ।। ६ १/२ ।। तस्यां विदीर्यमाणायां शिनेः पौत्रो महारथः ।। ७ ।। सप्त वीरान् महेष्वासानग्रानीकेष्वपोथयत् । उस सेनाके छिन्न-भिन्न होते ही शिनिके महारथी पौत्रने सेनाके मुहानेपर खड़े हुए सात महाधनुर्धर वीरोंको मार गिराया ।। ७ १/२ ।। अथान्यानपि राजेन्द्र नानाजनपदेश्वरान् ।। ८ ।। शरैरनलसंकाशैर्निन्ये वीरान् यमक्षयम् । राजेन्द्र! तदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी अन्यान्य वीर राजाओंको भी उन्होंने अपने अग्निसदृश बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। ८ १/२ ।। शतमेकेन विव्याध शतेनैकं च पत्रिणाम् ।। ९ ।। द्विपारोहान् द्विपांश्चैव हयारोहान् हयांस्तथा । रथिनः साश्वसूतांश्च जघानेशः पशूनिव ।। १० ।। वे एक बाणसे सैकड़ों वीरोंको और सैकड़ों बाणोंसे एक-एक वीरको घायल करने लगे। जिस प्रकार भगवान् पशुपति पशुओंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार सात्यकिने हाथीसवारों और हाथियोंको, घुड़सवारों और घोड़ोंको तथा घोड़े और सारथिसहित रथियोंको मार डाला ।। ९-१० ।। तं तथाद्भुतकर्माणं शरसम्पातवर्षिणम् । न केचनाभ्यधावन् वै सात्यकिं तव सैनिकाः ।। ११ ।। इस प्रकार बाणधाराकी वर्षा करनेवाले उस अद्भुत पराक्रमी सात्यकिके सामने जानेका साहस आपके कोई सैनिक न कर सके ।। ११ ।। ते भीता मृद्यमानाश्च प्रमृष्टा दीर्घबाहुना । आयोधनं जहुर्वीरा दृष्ट्वा तमतिमानिनम् ।। १२ ।। उस महाबाहु वीरने अपने बाणोंसे रौंदकर आपके सारे सिपाहियोंको मसल डाला। वे वीर सिपाही ऐसे डर गये कि उस अत्यन्त मानी शूरवीरको देखते ही युद्धका मैदान छोड़ देते थे ।। १२ ।। तमेकं बहुधापश्यन् मोहितास्तस्य तेजसा । रथैर्विमथितैश्चैव भग्ननीडैश्च मारिष ।। १३ ।। चक्रैर्विमथितैश्छत्रैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः । अनुकर्षैः पताकाभिः शिरस्त्राणैः सकाञ्चनैः ।। १४ ।। बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैश्च विशाम्पते । हस्तिहस्तोपमैश्चापि भुजङ्गाभोगसंनिभैः ।। १५ ।।

ऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप । माननीय नरेश! सारे कौरव-सैनिक सात्यकिके तेजसे मोहित हो अकेले होनेपर भी उन्हें अनेक रूपोंमें देखने लगे। वहाँ बहुसंख्यक रथ चूर-चूर हो गये थे। उनकी बैठकें टूट-फूट गयी थीं। पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। छत्र और ध्वज छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़े थे। अनुकर्ष, पताका, शिरस्त्राण, सुवर्णभूषित अंगदयुक्त चन्दनचर्चित भुजाएँ, हाथीकी सूँड़ तथा सर्पोंके शरीरके समान मोटे-मोटे ऊरु सब ओर बिखरे पड़े थे। नरेश्वर! मनुष्योंके विभिन्न अंगों तथा रथके पूर्वोक्त अवयवोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ।। १३—१५ ½ ।।

शशाङ्कसंनिभैश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। १६ ।। पतितैर्ऋषभाक्षाणां सा बभावति मेदिनी । वृषभके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वीरोंके गिरे हुए मनोहर कुण्डलमण्डित चन्द्रमा-जैसे मुखोंसे वहाँकी भूमि अत्यन्त शोभा पा रही थी ।। १६ ½ ।।

गजैश्च बहुधा छिन्नैः शयानैः पर्वतोपमैः ।। १७ ।। रराजातिभृशं भूमिविकीर्णैरिव पर्वतैः । अनेकों टुकड़ोंमें कटकर धराशायी हुए पर्वताकार गजराजोंसे वहाँकी भूमि इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न हो रही थी, मानो वहाँ बहुत-से पर्वत बिखरे हुए हों ।।

तपनीयमयैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः ।। १८ ।। उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः । गतसत्त्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ।। १९ ।। कितने ही घोड़े सुनहरी रस्सियों तथा मोतीकी जालियोंसे विभूषित विचित्र आच्छादन वस्त्रोंसे विशेष शोभायमान हो रहे थे। महाबाहु सात्यकिके द्वारा रौंदे जाकर वे धरतीपर पड़े थे और उनके प्राण-पखेरू उड़ गये ।। १८-१९ ।।

नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः । प्रविष्टस्तावकं सैन्यं द्रावयित्वा चमूं भृशम् ।। २० ।। इस प्रकार आपकी नाना प्रकारकी सेनाओंका संहार करके तथा बहुत-से सैनिकोंको भगाकर सात्यकि आपकी सेनाके भीतर घुस गये ।। २० ।।

ततस्तेनैव मार्गेण येन यातो धनंजयः । इयेष सात्यकिर्गन्तुं ततो द्रोणेन वारितः ।। २१ ।। तदनन्तर जिस मार्गसे अर्जुन गये, उसीसे सात्यकिने भी जानेका विचार किया; परंतु द्रोणाचार्यने उन्हें रोक दिया ।। २१ ।।

भारद्वाजं समासाद्य युयुधानश्च सात्यकिः । न न्यवर्तत संक्रुद्धो वेलामिव जलाशयः ।। २२ ।।

अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए सत्यकनन्दन युयुधान द्रोणाचार्यके पास पहुँचकर रुक तो गये; परंतु पीछे नहीं लौटे। जैसे क्षुब्ध जलाशय अपनी तटभूमितक पहुँचकर फिर पीछे नहीं लौटता है ।। २२ ।। निवार्य तु रणे द्रोणो युयुधानं महारथम् । विव्याध निशितैर्बाणैः पञ्चभिर्मर्मभेदिभिः ।। २३ ।। द्रोणाचार्यने रणक्षेत्रमें महारथी युयुधानको रोककर मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले पाँच पैने बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ।। २३ ।। सात्यकिस्तु रणे द्रोणं राजन् विव्याध सप्तभिः । हेमपुङ्खैः शिलाधौतैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।। २४ ।। राजन्! तब सात्यकिने भी समरांगणमें शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पाँखवाले तथा कंक और मोरकी पाँखोंसे संयुक्त हुए सात बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर डाला ।। २४ ।। तं षड्भिः सायकैर्द्रोणः साश्वयन्तारमर्दयत् । स तं न ममृषे द्रोणं युयुधानो महारथः ।। २५ ।। फिर द्रोणने छः बाण मारकर घोड़ों और सारथिसहित सात्यकिको पीड़ित कर दिया। द्रोणाचार्यके इस पराक्रमको महारथी युयुधान सहन न कर सके ।। २५ ।। सिंहनादं ततः कृत्वा द्रोणं विव्याध सात्यकिः । दशभिः सायकैश्चान्यैः षड्भिरष्टाभिरेव च ।। २६ ।। उन्होंने सिंहनाद करके लगातार दस, छः और आठ बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको गहरी चोट पहुँचायी ।। २६ ।। युयुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः । एकेन सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।। २७ ।। ध्वजमेकेन बाणेन विव्याध युधि मारिष । माननीय नरेश! तदनन्तर युयुधानने पुनः दस बाण मारकर द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। फिर एक बाणसे उनके सारथिको, चारसे चारों घोड़ोंको और एक बाणसे उनकी ध्वजाको युद्धस्थलमें बींध डाला ।। २७ १/२ ।। तं द्रोणः साश्वयन्तारं सरथध्वजमाशुगैः ।। २८ ।। त्वरन् प्राच्छादयद् बाणैः शलभानामिव व्रजैः । इसके बाद द्रोणाचार्यने उतावले होकर टिड्डीदलोंके समान अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि, रथ और ध्वजसहित सात्यकिको आच्छादित कर दिया ।। २८ १/२ ।। तथैव युयुधानोऽपि द्रोणं बहुभिराशुगैः ।। २९ ।। आच्छादयदसम्भ्रान्तस्ततो द्रोण उवाच ह ।

इसी प्रकार सात्यकिने भी बिना किसी घबराहटके बहुत-से शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करके द्रोणाचार्यको ढक दिया। तब द्रोणाचार्य बोले— ।। २९ १/२ ।। तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा ।। ३० ।। युध्यमानं च मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत । त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन् यास्यसि माधव ।। ३१ ।। यदि मां त्वं रणे हित्वा न यास्याचार्यवद् द्रुतम् । ‘माधव! तुम्हारे आचार्य अर्जुन तो कायरके समान युद्धका मैदान छोड़कर चले गये हैं। मैं युद्ध कर रहा था तो भी मुझे छोड़कर मेरी परिक्रमा करते हुए चल दिये। तुम भी अपने आचार्यके समान तुरंत ही समरांगणमें मुझे छोड़कर चले नहीं जाओगे तो युद्धमें तत्पर रहते हुए मेरे हाथसे आज जीवित बचकर नहीं जा सकोगे’ ।। ३०-३१ १/२ ।।

सात्यकिरुवाच

धनंजयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात् ।। ३२ ।। गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन् न मे कालात्ययो भवेत् । आचार्यानुगतो मार्गः शिष्यैरन्वास्यते सदा ।। ३३ ।। तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गतः । सात्यकिने कहा—ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं धर्मराजकी आज्ञासे धनंजयके मार्गपर जा रहा हूँ। आप ऐसा करें, जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्यगण तो सदासे ही अपने आचार्यके मार्गका ही अनुसरण करते आये हैं। अतः जिस प्रकार मेरे गुरुजी गये हैं, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही चला जाता हूँ ।। ३२-३३ १/२ ।।

संजय उवाच

एतावदुक्त्वा शैनेय आचार्यं परिवर्जयन् ।। ३४ ।। प्रयातः सहसा राजन् सारथिं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर सात्यकि सहसा द्रोणाचार्यको छोड़कर चल दिये और सारथिसे इस प्रकार बोले— ।। ३४ १/२ ।। द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे ।। ३५ ।। यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् । ‘सूत! द्रोणाचार्य मुझे रोकनेके लिये सब प्रकारसे प्रयत्न करेंगे, अतः तुम रणक्षेत्रमें सावधान होकर चलो और मेरी यह दूसरी बात भी सुन लो ।। ३५ १/२ ।। एतदालोक्यते सैन्यमावन्त्यानां महाप्रभम् ।। ३६ ।। अस्यान्तरतस्त्वेतद् दाक्षिणात्यं महद् बलम् । तदनन्तरमेतच्च बाह्लिकानां महद् बलम् ।। ३७ ।।

‘यह अवन्तिनिवासियोंकी अत्यन्त तेजस्विनी सेना दिखायी देती है। इसके बाद यह दाक्षिणात्योंकी विशाल सेना है। उसके पश्चात् यह बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी है॥ ३६-३७॥

बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद् बलम्।
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे॥ ३८॥

‘बाह्लिकोंके पास ही उनसे जुड़ी हुई कर्णकी बड़ी भारी सेना खड़ी है। सारथे! ये सारी सेनाएँ एक-दूसरेसे भिन्न हैं॥ ३८॥

अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम्।
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान् प्रहृष्टवत्॥ ३९॥

‘ये सब-की-सब एक-दूसरेका सहारा लेकर युद्धके लिये डटी हुई हैं। ये कभी भी समरांगणका परित्याग नहीं करेंगी। तुम इन्हींके बीचमें होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाओ॥ ३९॥

मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे।
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः॥ ४०॥

‘सारथे! मध्यम वेगका आश्रय लेकर तुम मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धके लिये उद्यत हुए बाह्लिकदेशीय सैनिक दिखायी देते हैं॥

दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः।
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते॥ ४१॥
नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम्।

‘जहाँ सूतपुत्र कर्णको आगे करके बहुत-से दाक्षिणात्य योद्धा खड़े हैं, हाथी, घोड़ों और रथोंसे भरी हुई जो वह सेना दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें अनेक देशोंके पैदल सैनिक मौजूद हैं; तुम वहाँ भी मेरे रथको ले चलो’॥ ४१ १/२॥

एतावदुक्त्वा यन्तारं ब्राह्मणं परिवर्जयन्॥ ४२॥
स व्यतीयाय यत्रोग्रं कर्णस्य च महद् बलम्।

सारथिसे ऐसा कहकर सात्यकि ब्राह्मण द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए सबको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ कर्णकी भयंकर एवं विशाल सेना खड़ी थी॥ ४२ १/२॥

तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन् विशिखान् बहून्॥ ४३॥
युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम्।

युद्धसे पीछे न हटनेवाले महाभाग युयुधानको आगे बढ़ते देख द्रोणाचार्य कुपित हो उठे और वे बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे दौड़े॥ ४३ १/२॥

कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः॥ ४४॥
प्राविशद् भारतीं सेनामपर्यन्तां च सात्यकिः।

सात्यकि कर्णकी विशाल वाहिनीको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करके अपार कौरवी सेनामें घुस गये ।। प्रविष्टे युयुधाने तु सैनिकेषु द्रुतेषु च ।। ४५ ।। अमर्षी कृतवर्मा तु सात्यकिं पर्यवारयत् । सात्यकिके प्रवेश करते ही सारे कौरव-सैनिक भागने लगे। तब क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने उन्हें आ घेरा ।। तमापतन्तं विशिखैः षड्भिराहत्य सात्यकिः ।। ४६ ।। चतुर्भिंश्चतुरोऽस्याश्वान्याजघानाशु वीर्यवान् । उसे आते देख पराक्रमी सात्यकिने छः बाणोंद्वारा उसे चोट पहुँचाकर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको शीघ्र ही घायल कर दिया ।। ४६ १/२ ।। ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः ।। ४७ ।। सात्यकिः कृतवर्माणं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । तदनन्तर पुनः झुकी हुई गाँठवाले सोलह बाण मारकर सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। ४७ १/२ ।। स ताड्यमानो विशिखैर्बहुभिस्तिग्मतेजनैः ।। ४८ ।। सात्वतेन महाराज कृतवर्मा न चक्षमे । महाराज! सात्यकिके प्रचण्ड तेजवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल होनेपर कृतवर्मा सहन न कर सका ।। स वत्सदन्तं संधाय जिह्मगानलसंनिभम् ।। ४९ ।। आकृष्य राजन्नाकर्णाद् विव्याधोरसि सात्यकिम् । राजन्! वक्रगतिसे चलनेवाले अग्निके समान तेजस्वी वत्सदन्त नामक बाणको धनुषपर रखकर कृतवर्माने उसे कानतक खींचा और उसके द्वारा सात्यकिकी छातीमें प्रहार किया ।। ४९ १/२ ।। स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ।। ५० ।। सपुङ्खपत्रः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः । वह बाण सात्यकिके शरीर और कवच दोनोंको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो पंख एवं पत्रसहित धरतीमें समा गया ।। ५० १/२ ।। अथास्य बहुभिर्बाणैश्छिनत् परमास्त्रवित् ।। ५१ ।। समार्गणगणं राजन् कृतवर्मा शरासनम् । राजन्! कृतवर्मा उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता है। उसने बहुत-से बाण चलाकर बाणसमूहोंसहित सात्यकिके शरासनको काट दिया ।। ५१ १/२ ।। विव्याध च रणे राजन् सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।। ५२ ।।

दशभिर्विशिखैस्तीक्ष्णैरभिक्रुद्धः स्तनान्तरे ।
नरेश्वर! इसके बाद क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने सत्यपराक्रमी सात्यकिकी छातीमें पुनः दस पैने बाणोंद्वारा गहरा आघात किया ॥ ५२१/२ ॥
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः ।। ५३ ।।
जघान दक्षिणं बाहुं सात्यकिः कृतवर्मणः ।
धनुष कट जानेपर शक्तिशाली शूरवीरोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने कृतवर्माकी दाहिनी भुजापर शक्तिद्वारा ही प्रहार किया ॥ ५३१/२ ॥
ततोऽन्यत् सुदृढं चापं पूर्णमायम्य सात्यकिः ।। ५४ ।।
व्यसृजद् विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ।
सरथं कृतवर्माणं समन्तात् पर्यवारयत् ।। ५५ ।।
तदनन्तर दूसरे सुदृढ़ धनुषको अच्छी तरह खींचकर सात्यकिने तुरंत ही सैकड़ों और हजारों बाणोंकी वर्षा की और रथसहित कृतवर्माको सब ओरसे ढक दिया ॥ ५५ ॥
छादयित्वा रणे राजन् हार्दिक्यं स तु सात्यकिः ।
अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत ।। ५६ ।।
राजन्! रणक्षेत्रमें इस प्रकार कृतवर्माको आच्छादित करके सात्यकिने एक भल्ल द्वारा उसके सारथिका सिर काट दिया ॥ ५६ ॥
स पपात हतः सूतो हार्दिक्यस्य महारथात् ।
ततस्ते यन्तर्रहिताः प्राद्रवंस्तुरगा भृशम् ।। ५७ ।।
उनके द्वारा मारा गया सारथि कृतवर्माके विशाल रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो सारथिके बिना उसके घोड़े बड़े जोरसे भागने लगे ॥ ५७ ॥
अथ भोजस्तु सम्भ्रान्तो निगृह्य तुरगान् स्वयम् ।
तस्थौ वीरो धनुष्पाणिस्तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन् ।। ५८ ।।
इससे कृतवर्माको बड़ी घबराहट हुई; परंतु वह वीर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके हाथमें धनुष ले युद्धके लिये डट गया। उसके इस कर्मकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ५८ ॥
स मुहूर्तमिवाश्वस्य सदश्वांन् समनोदयत् ।
व्यपेतभीरमित्राणामावहत् सुमहद् भयम् ।। ५९ ।।
उसने थोड़ी ही देरमें आश्वस्त होकर अपने उत्तम घोड़ोंको आगे बढ़ाया तथा स्वयं निर्भय रहकर शत्रुओंके हृदयमें महान् भय उत्पन्न कर दिया ॥ ५९ ॥
सात्यकिश्चाभ्यगात् तस्मात् स तु भीममुपाद्रवत् ।
युयुधानोऽपि राजेन्द्र भोजानीकाद् विनिःसृतः ।। ६० ।।
प्रययौ त्वरितस्तूर्णं काम्बोजानां महाचमूम् ।
स तत्र बहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः ।। ६१ ।।

न चचाल तदा राजन् सात्यकिः सत्यविक्रमः । राजेन्द्र! यही अवसर पाकर सात्यकि वहाँसे आगे निकल गये। तब कृतवर्माने भीमसेनपर धावा किया। कृतवर्माकी सेनासे निकलकर युयुधान तुरंत ही काम्बोजोंकी विशाल वाहिनीके पास आ पहुँचे। वहाँ बहुत-से शूरवीर महारथियोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया। महाराज! तो भी उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि विचलित नहीं हुए ॥ ६०-६१ १/२ ॥

संधाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च ॥ ६२ ॥ अभ्यधावद् रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया । द्रोणाचार्यने अपनी बिखरी हुई सेनाको एकत्र करके उसकी रक्षाका भार कृतवर्माको सौंपकर समरांगणमें सात्यकिके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उद्यत हो उनके पीछे-पीछे दौड़े ॥ ६२ १/२ ॥

तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः ॥ ६३ ॥ न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः । इस प्रकार उन्हें युयुधानके पीछे दौड़ते देख पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीर हर्षमें भरकर द्रोणाचार्यको रोकनेका प्रयत्न करने लगे ॥ ६३ १/२ ॥

समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥ ६४ ॥ पञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः । परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माके पास पहुँचकर भीमसेनको आगे करके आक्रमण करनेवाले पांचालोंका उत्साह नष्ट हो गया ॥ ६४ १/२ ॥

विक्रम्य वारिता राजन् वीरेण कृतवर्मणा ॥ ६५ ॥ यतमानांश्च तान् सर्वानीषद्विगतचेतसः । अभितस्तान् शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥ ६६ ॥ राजन्! वीर कृतवर्माने पराक्रम करके उनको रोक दिया। वे सभी वीर कुछ-कुछ शिथिल एवं अचेत-से हो रहे थे तो भी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे; परंतु कृतवर्माने सब ओरसे उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करके उनके वाहनोंको व्याकुल कर दिया ॥ ६५-६६ ॥

निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे । अतिष्ठन्नार्यवद् वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥ ६७ ॥ कृतवर्माद्वारा रोके जानेपर वे पाण्डव वीर रणक्षेत्रमें महान् यशकी इच्छा करते हुए उसीकी सेनाके साथ युद्धकी अभिलाषा करके श्रेष्ठ पुरुषोंके समान डटकर खड़े हो गये ॥ ६७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिप्रवेशविषयक एक
सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६८ श्लोक हैं)

११४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय

धृतराष्ट्र उवाच

एवं बहुगुणं सैन्यमेवं प्रविचितं बलम् ।
व्यूढमेवं यथान्यायमेवं बहु च संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! मेरी सेना इस प्रकार अनेक गुणोंसे सम्पन्न है और इस तरह अधिक संख्यामें इसका संग्रह किया गया है। पाण्डव-सेनाकी अपेक्षा यह प्रबल भी है। इसकी व्यूह-रचना भी इस प्रकार शास्त्रीय विधिके अनुसार की जाती है और इस तरह बहुत-से योद्धाओंका समूह जुट गया है ॥ १ ॥

नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा ।
प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद् दृष्टविक्रमम् ॥ २ ॥
हमलोगोंने सदा अपनी सेनाका आदर-सत्कार किया है तथा वह हमारे प्रति सदासे ही अनुरक्त भी है। हमारे सैनिक युद्धकी कलामें बढ़े-चढ़े हैं। हमारा सैन्यसमुदाय देखनेमें अद्भुत जान पड़ता है तथा इस सेनामें वे ही लोग चुन-चुनकर रखे गये हैं जिनका पराक्रम पहलेसे ही देख लिया गया है ॥ २ ॥

नातिवृद्धमबालं च नाकृशं नातिपीवरम् ।
लघुवृत्तायतप्रायं सारगात्रमनामयम् ॥ ३ ॥
इसमें न तो कोई अधिक बूढ़ा है, न बालक है, न अधिक दुबला है और न बहुत ही मोटा है। उनका शरीर हलका, सुडौल तथा प्रायः लंबा है। शरीरका एक-एक अवयव सारवान् (सबल) तथा सभी सैनिक नीरोग एवं स्वस्थ हैं ॥ ३ ॥

आत्तसंनाहसंछन्नं बहुशस्त्रपरिच्छदम् ।
शस्त्रग्रहणविद्यासु बह्वीषु परिनिष्ठितम् ॥ ४ ॥
इन सैनिकोंका शरीर बँधे हुए कवचसे आच्छादित है। इनके पास शस्त्र आदि आवश्यक सामग्रियोंकी बहुतायत है। ये सभी सैनिक शस्त्रग्रहणसम्बन्धी बहुत-सी विद्याओंमें प्रवीण हैं ॥ ४ ॥

आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते ।
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् ॥ ५ ॥

चढ़ने, उतरने, फैलने, कूद-कूदकर चलने, भली-भाँति प्रहार करने, युद्धके लिये जाने और अवसर देखकर पलायन करनेमें भी कुशल हैं ।। ५ ।।

नागेष्वश्वेषु बहुशो रथेषु च परीक्षितम् ।
परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम् ।। ६ ।।
हाथियों, घोड़ों तथा रथोंपर बैठकर युद्ध करनेकी कलामें सब लोगोंकी परीक्षा ली जा चुकी है और परीक्षा लेनेके पश्चात् उन्हें यथायोग्य वेतन दिया गया है ।। ६ ।।

न गोष्ठ्या नोपकारेण न सम्बन्धनिमित्ततः ।
नानाहूतं नाप्यभृतं मम सैन्यं बभूव ह ।। ७ ।।
हमने किसीको भी गोष्ठीद्वारा बहकाकर, उपकार करके अथवा किसी सम्बन्धके कारण सेनामें भर्ती नहीं किया है। इनमें ऐसा भी कोई नहीं है जिसे बुलाया न गया हो अथवा जिसे बेगारमें पकड़कर लाया गया हो। मेरी सारी सेनाकी यही स्थिति है ।। ७ ।।

कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् ।
कृतमानोपचारं च यशस्वि च मनस्वि च ।। ८ ।।
इसमें सभी लोग कुलीन, श्रेष्ठ, हृष्ट-पुष्ट, उद्धण्डताशून्य, पहलेसे सम्मानित, यशस्वी तथा मनस्वी हैं ।।

सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्बहुभिः पुण्यकर्मभिः ।
लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ।। ९ ।।
तात! हमारे मन्त्री तथा अन्य बहुतेरे प्रमुख कार्यकर्ता जो पुण्यात्मा, लोकपालोंके समान पराक्रमी और मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं, सदा इस सेनाका पालन करते आये हैं ।। ९ ।।

बहुभिः पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रियचिकीर्षुभिः ।
अस्मानभिसृतैः कामात् सबलैः सपदानुगैः ।। १० ।।
हमारा प्रिय करनेकी इच्छावाले तथा सेना और अनुचरोंसहित स्वेच्छासे ही हमारे पक्षमें आये हुए बहुत-से भूपालगण भी इसकी रक्षामें तत्पर रहते हैं ।।

महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः ।
अपक्षैः पक्षिसंकाशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ।। ११ ।।
सम्पूर्ण दिशाओंसे बहकर आयी हुई नदियोंसे परिपूर्ण होनेवाले महासागरके समान हमारी यह सेना अगाध और अपार है। पक्षरहित एवं पक्षियोंके समान तीव्र वेगसे चलनेवाले रथों और घोड़ोंसे यह भरी हुई है ।। ११ ।।

प्रभिन्नकरटैश्चैव द्विरदैरावृतं महत् ।
यदहन्यत मे सैन्यं किमन्यद् भागधेयतः ।। १२ ।।
गण्डस्थलसे मद बहानेवाले गजराजोंद्वारा आवृत यह मेरी विशाल वाहिनी यदि शत्रुओंद्वारा मारी गयी है तो इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ।। १२ ।।

योधाक्षय्यजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गणम् ।

क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ॥ १३ ॥ ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम् । वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् ॥ १४ ॥ द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् । जलसंधमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम् ॥ १५ ॥ संजय! मेरी सेना भयंकर समुद्रके समान जान पड़ती है। योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं, वाहन ही इसकी तरंगमालाएँ हैं, क्षेपणीय, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र-शस्त्र इसमें मछलियोंके समान भरे हुए हैं। ध्वजा और आभूषणोंके समुदाय इसके भीतर रत्नोंके समान संचित हैं। दौड़ते हुए वाहन ही वायुके वेग हैं, जिनसे यह सैन्यसमुद्र कम्पित एवं क्षुब्ध-सा जान पड़ता है। द्रोणाचार्य ही इसकी पातालतक फैली हुई गहराई है। कृतवर्मा इसमें महान् ह्रदके समान है, जलसंध विशाल ग्राह है और कर्णरूपी चन्द्रमाके उदयसे यह सदा उद्वेलित होता रहता है ॥ १३—१५ ॥ गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे । संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम् ॥ १६ ॥ तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि । सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय ॥ १७ ॥ संजय! ऐसे मेरे सैन्यरूपी महासागरका वेगपूर्वक भेदन करके जब पाण्डवश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन तथा सात्वतवंशी उदार महारथी युयुधान एकमात्र रथकी सहायतासे इसके भीतर घुस गये, तब मैं अपनी सेनाके शेष रहनेकी आशा नहीं देखता हूँ ॥ १६-१७ ॥ तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वातीव तरस्विनौ । सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ॥ १८ ॥ किं नु वा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः । दारुणैकायने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ॥ १९ ॥ उन दोनों अत्यन्त वेगशाली वीरोंको वहाँ सबका उल्लंघन करके घुसे हुए देख तथा सिन्धुराज जयद्रथको गाण्डीवसे छूटे हुए बाणोंकी सीमामें उपस्थित पाकर कालप्रेरित कौरवोंने वहाँ कौन-सा कार्य किया? उस दारुण संहारके समय, जहाँ मृत्युके सिवा दूसरी कोई गति नहीं थी, किस प्रकार उन्होंने कर्तव्यका निश्चय किया? ॥ १८-१९ ॥ ग्रस्तान् हि कौरवान् मन्ये मृत्युना तात संगतान् । विक्रमोऽपि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै ॥ २० ॥ तात! मैं युद्धस्थलमें एकत्र हुए कौरवोंको कालका ग्रास ही मानता हूँ; क्योंकि रणक्षेत्रमें उनका पराक्रम भी पहले-जैसा नहीं दिखायी देता है ॥ २० ॥ अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ ।