महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार सात्यकिने भी बिना किसी घबराहटके बहुत-से शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करके द्रोणाचार्यको ढक दिया। तब द्रोणाचार्य बोले— ।। २९ १/२ ।। तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा ।। ३० ।। युध्यमानं च मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत । त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन् यास्यसि माधव ।। ३१ ।। यदि मां त्वं रणे हित्वा न यास्याचार्यवद् द्रुतम् । ‘माधव! तुम्हारे आचार्य अर्जुन तो कायरके समान युद्धका मैदान छोड़कर चले गये हैं। मैं युद्ध कर रहा था तो भी मुझे छोड़कर मेरी परिक्रमा करते हुए चल दिये। तुम भी अपने आचार्यके समान तुरंत ही समरांगणमें मुझे छोड़कर चले नहीं जाओगे तो युद्धमें तत्पर रहते हुए मेरे हाथसे आज जीवित बचकर नहीं जा सकोगे’ ।। ३०-३१ १/२ ।।
सात्यकिरुवाच
धनंजयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात् ।। ३२ ।। गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन् न मे कालात्ययो भवेत् । आचार्यानुगतो मार्गः शिष्यैरन्वास्यते सदा ।। ३३ ।। तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गतः । सात्यकिने कहा—ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं धर्मराजकी आज्ञासे धनंजयके मार्गपर जा रहा हूँ। आप ऐसा करें, जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्यगण तो सदासे ही अपने आचार्यके मार्गका ही अनुसरण करते आये हैं। अतः जिस प्रकार मेरे गुरुजी गये हैं, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही चला जाता हूँ ।। ३२-३३ १/२ ।।
संजय उवाच
एतावदुक्त्वा शैनेय आचार्यं परिवर्जयन् ।। ३४ ।। प्रयातः सहसा राजन् सारथिं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर सात्यकि सहसा द्रोणाचार्यको छोड़कर चल दिये और सारथिसे इस प्रकार बोले— ।। ३४ १/२ ।। द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे ।। ३५ ।। यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् । ‘सूत! द्रोणाचार्य मुझे रोकनेके लिये सब प्रकारसे प्रयत्न करेंगे, अतः तुम रणक्षेत्रमें सावधान होकर चलो और मेरी यह दूसरी बात भी सुन लो ।। ३५ १/२ ।। एतदालोक्यते सैन्यमावन्त्यानां महाप्रभम् ।। ३६ ।। अस्यान्तरतस्त्वेतद् दाक्षिणात्यं महद् बलम् । तदनन्तरमेतच्च बाह्लिकानां महद् बलम् ।। ३७ ।।