महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 764, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘यह अवन्तिनिवासियोंकी अत्यन्त तेजस्विनी सेना दिखायी देती है। इसके बाद यह दाक्षिणात्योंकी विशाल सेना है। उसके पश्चात् यह बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी है॥ ३६-३७॥
बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद् बलम्।
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे॥ ३८॥
‘बाह्लिकोंके पास ही उनसे जुड़ी हुई कर्णकी बड़ी भारी सेना खड़ी है। सारथे! ये सारी सेनाएँ एक-दूसरेसे भिन्न हैं॥ ३८॥
अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम्।
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान् प्रहृष्टवत्॥ ३९॥
‘ये सब-की-सब एक-दूसरेका सहारा लेकर युद्धके लिये डटी हुई हैं। ये कभी भी समरांगणका परित्याग नहीं करेंगी। तुम इन्हींके बीचमें होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाओ॥ ३९॥
मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे।
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः॥ ४०॥
‘सारथे! मध्यम वेगका आश्रय लेकर तुम मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धके लिये उद्यत हुए बाह्लिकदेशीय सैनिक दिखायी देते हैं॥
दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः।
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते॥ ४१॥
नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम्।
‘जहाँ सूतपुत्र कर्णको आगे करके बहुत-से दाक्षिणात्य योद्धा खड़े हैं, हाथी, घोड़ों और रथोंसे भरी हुई जो वह सेना दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें अनेक देशोंके पैदल सैनिक मौजूद हैं; तुम वहाँ भी मेरे रथको ले चलो’॥ ४१ १/२॥
एतावदुक्त्वा यन्तारं ब्राह्मणं परिवर्जयन्॥ ४२॥
स व्यतीयाय यत्रोग्रं कर्णस्य च महद् बलम्।
सारथिसे ऐसा कहकर सात्यकि ब्राह्मण द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए सबको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ कर्णकी भयंकर एवं विशाल सेना खड़ी थी॥ ४२ १/२॥
तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन् विशिखान् बहून्॥ ४३॥
युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम्।
युद्धसे पीछे न हटनेवाले महाभाग युयुधानको आगे बढ़ते देख द्रोणाचार्य कुपित हो उठे और वे बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे दौड़े॥ ४३ १/२॥
कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः॥ ४४॥
प्राविशद् भारतीं सेनामपर्यन्तां च सात्यकिः।