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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

‘यह अवन्तिनिवासियोंकी अत्यन्त तेजस्विनी सेना दिखायी देती है। इसके बाद यह दाक्षिणात्योंकी विशाल सेना है। उसके पश्चात् यह बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी है॥ ३६-३७॥

बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद् बलम्।
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे॥ ३८॥

‘बाह्लिकोंके पास ही उनसे जुड़ी हुई कर्णकी बड़ी भारी सेना खड़ी है। सारथे! ये सारी सेनाएँ एक-दूसरेसे भिन्न हैं॥ ३८॥

अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम्।
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान् प्रहृष्टवत्॥ ३९॥

‘ये सब-की-सब एक-दूसरेका सहारा लेकर युद्धके लिये डटी हुई हैं। ये कभी भी समरांगणका परित्याग नहीं करेंगी। तुम इन्हींके बीचमें होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाओ॥ ३९॥

मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे।
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः॥ ४०॥

‘सारथे! मध्यम वेगका आश्रय लेकर तुम मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धके लिये उद्यत हुए बाह्लिकदेशीय सैनिक दिखायी देते हैं॥

दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः।
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते॥ ४१॥
नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम्।

‘जहाँ सूतपुत्र कर्णको आगे करके बहुत-से दाक्षिणात्य योद्धा खड़े हैं, हाथी, घोड़ों और रथोंसे भरी हुई जो वह सेना दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें अनेक देशोंके पैदल सैनिक मौजूद हैं; तुम वहाँ भी मेरे रथको ले चलो’॥ ४१ १/२॥

एतावदुक्त्वा यन्तारं ब्राह्मणं परिवर्जयन्॥ ४२॥
स व्यतीयाय यत्रोग्रं कर्णस्य च महद् बलम्।

सारथिसे ऐसा कहकर सात्यकि ब्राह्मण द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए सबको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ कर्णकी भयंकर एवं विशाल सेना खड़ी थी॥ ४२ १/२॥

तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन् विशिखान् बहून्॥ ४३॥
युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम्।

युद्धसे पीछे न हटनेवाले महाभाग युयुधानको आगे बढ़ते देख द्रोणाचार्य कुपित हो उठे और वे बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे दौड़े॥ ४३ १/२॥

कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः॥ ४४॥
प्राविशद् भारतीं सेनामपर्यन्तां च सात्यकिः।

सात्यकि कर्णकी विशाल वाहिनीको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करके अपार कौरवी सेनामें घुस गये ।। प्रविष्टे युयुधाने तु सैनिकेषु द्रुतेषु च ।। ४५ ।। अमर्षी कृतवर्मा तु सात्यकिं पर्यवारयत् । सात्यकिके प्रवेश करते ही सारे कौरव-सैनिक भागने लगे। तब क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने उन्हें आ घेरा ।। तमापतन्तं विशिखैः षड्भिराहत्य सात्यकिः ।। ४६ ।। चतुर्भिंश्चतुरोऽस्याश्वान्याजघानाशु वीर्यवान् । उसे आते देख पराक्रमी सात्यकिने छः बाणोंद्वारा उसे चोट पहुँचाकर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको शीघ्र ही घायल कर दिया ।। ४६ १/२ ।। ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः ।। ४७ ।। सात्यकिः कृतवर्माणं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । तदनन्तर पुनः झुकी हुई गाँठवाले सोलह बाण मारकर सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। ४७ १/२ ।। स ताड्यमानो विशिखैर्बहुभिस्तिग्मतेजनैः ।। ४८ ।। सात्वतेन महाराज कृतवर्मा न चक्षमे । महाराज! सात्यकिके प्रचण्ड तेजवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल होनेपर कृतवर्मा सहन न कर सका ।। स वत्सदन्तं संधाय जिह्मगानलसंनिभम् ।। ४९ ।। आकृष्य राजन्नाकर्णाद् विव्याधोरसि सात्यकिम् । राजन्! वक्रगतिसे चलनेवाले अग्निके समान तेजस्वी वत्सदन्त नामक बाणको धनुषपर रखकर कृतवर्माने उसे कानतक खींचा और उसके द्वारा सात्यकिकी छातीमें प्रहार किया ।। ४९ १/२ ।। स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ।। ५० ।। सपुङ्खपत्रः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः । वह बाण सात्यकिके शरीर और कवच दोनोंको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो पंख एवं पत्रसहित धरतीमें समा गया ।। ५० १/२ ।। अथास्य बहुभिर्बाणैश्छिनत् परमास्त्रवित् ।। ५१ ।। समार्गणगणं राजन् कृतवर्मा शरासनम् । राजन्! कृतवर्मा उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता है। उसने बहुत-से बाण चलाकर बाणसमूहोंसहित सात्यकिके शरासनको काट दिया ।। ५१ १/२ ।। विव्याध च रणे राजन् सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।। ५२ ।।

दशभिर्विशिखैस्तीक्ष्णैरभिक्रुद्धः स्तनान्तरे ।
नरेश्वर! इसके बाद क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने सत्यपराक्रमी सात्यकिकी छातीमें पुनः दस पैने बाणोंद्वारा गहरा आघात किया ॥ ५२१/२ ॥
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः ।। ५३ ।।
जघान दक्षिणं बाहुं सात्यकिः कृतवर्मणः ।
धनुष कट जानेपर शक्तिशाली शूरवीरोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने कृतवर्माकी दाहिनी भुजापर शक्तिद्वारा ही प्रहार किया ॥ ५३१/२ ॥
ततोऽन्यत् सुदृढं चापं पूर्णमायम्य सात्यकिः ।। ५४ ।।
व्यसृजद् विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ।
सरथं कृतवर्माणं समन्तात् पर्यवारयत् ।। ५५ ।।
तदनन्तर दूसरे सुदृढ़ धनुषको अच्छी तरह खींचकर सात्यकिने तुरंत ही सैकड़ों और हजारों बाणोंकी वर्षा की और रथसहित कृतवर्माको सब ओरसे ढक दिया ॥ ५५ ॥
छादयित्वा रणे राजन् हार्दिक्यं स तु सात्यकिः ।
अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत ।। ५६ ।।
राजन्! रणक्षेत्रमें इस प्रकार कृतवर्माको आच्छादित करके सात्यकिने एक भल्ल द्वारा उसके सारथिका सिर काट दिया ॥ ५६ ॥
स पपात हतः सूतो हार्दिक्यस्य महारथात् ।
ततस्ते यन्तर्रहिताः प्राद्रवंस्तुरगा भृशम् ।। ५७ ।।
उनके द्वारा मारा गया सारथि कृतवर्माके विशाल रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो सारथिके बिना उसके घोड़े बड़े जोरसे भागने लगे ॥ ५७ ॥
अथ भोजस्तु सम्भ्रान्तो निगृह्य तुरगान् स्वयम् ।
तस्थौ वीरो धनुष्पाणिस्तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन् ।। ५८ ।।
इससे कृतवर्माको बड़ी घबराहट हुई; परंतु वह वीर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके हाथमें धनुष ले युद्धके लिये डट गया। उसके इस कर्मकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ५८ ॥
स मुहूर्तमिवाश्वस्य सदश्वांन् समनोदयत् ।
व्यपेतभीरमित्राणामावहत् सुमहद् भयम् ।। ५९ ।।
उसने थोड़ी ही देरमें आश्वस्त होकर अपने उत्तम घोड़ोंको आगे बढ़ाया तथा स्वयं निर्भय रहकर शत्रुओंके हृदयमें महान् भय उत्पन्न कर दिया ॥ ५९ ॥
सात्यकिश्चाभ्यगात् तस्मात् स तु भीममुपाद्रवत् ।
युयुधानोऽपि राजेन्द्र भोजानीकाद् विनिःसृतः ।। ६० ।।
प्रययौ त्वरितस्तूर्णं काम्बोजानां महाचमूम् ।
स तत्र बहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः ।। ६१ ।।

न चचाल तदा राजन् सात्यकिः सत्यविक्रमः । राजेन्द्र! यही अवसर पाकर सात्यकि वहाँसे आगे निकल गये। तब कृतवर्माने भीमसेनपर धावा किया। कृतवर्माकी सेनासे निकलकर युयुधान तुरंत ही काम्बोजोंकी विशाल वाहिनीके पास आ पहुँचे। वहाँ बहुत-से शूरवीर महारथियोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया। महाराज! तो भी उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि विचलित नहीं हुए ॥ ६०-६१ १/२ ॥

संधाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च ॥ ६२ ॥ अभ्यधावद् रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया । द्रोणाचार्यने अपनी बिखरी हुई सेनाको एकत्र करके उसकी रक्षाका भार कृतवर्माको सौंपकर समरांगणमें सात्यकिके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उद्यत हो उनके पीछे-पीछे दौड़े ॥ ६२ १/२ ॥

तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः ॥ ६३ ॥ न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः । इस प्रकार उन्हें युयुधानके पीछे दौड़ते देख पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीर हर्षमें भरकर द्रोणाचार्यको रोकनेका प्रयत्न करने लगे ॥ ६३ १/२ ॥

समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥ ६४ ॥ पञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः । परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माके पास पहुँचकर भीमसेनको आगे करके आक्रमण करनेवाले पांचालोंका उत्साह नष्ट हो गया ॥ ६४ १/२ ॥

विक्रम्य वारिता राजन् वीरेण कृतवर्मणा ॥ ६५ ॥ यतमानांश्च तान् सर्वानीषद्विगतचेतसः । अभितस्तान् शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥ ६६ ॥ राजन्! वीर कृतवर्माने पराक्रम करके उनको रोक दिया। वे सभी वीर कुछ-कुछ शिथिल एवं अचेत-से हो रहे थे तो भी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे; परंतु कृतवर्माने सब ओरसे उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करके उनके वाहनोंको व्याकुल कर दिया ॥ ६५-६६ ॥

निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे । अतिष्ठन्नार्यवद् वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥ ६७ ॥ कृतवर्माद्वारा रोके जानेपर वे पाण्डव वीर रणक्षेत्रमें महान् यशकी इच्छा करते हुए उसीकी सेनाके साथ युद्धकी अभिलाषा करके श्रेष्ठ पुरुषोंके समान डटकर खड़े हो गये ॥ ६७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिप्रवेशविषयक एक
सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६८ श्लोक हैं)

११४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय

धृतराष्ट्र उवाच

एवं बहुगुणं सैन्यमेवं प्रविचितं बलम् ।
व्यूढमेवं यथान्यायमेवं बहु च संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! मेरी सेना इस प्रकार अनेक गुणोंसे सम्पन्न है और इस तरह अधिक संख्यामें इसका संग्रह किया गया है। पाण्डव-सेनाकी अपेक्षा यह प्रबल भी है। इसकी व्यूह-रचना भी इस प्रकार शास्त्रीय विधिके अनुसार की जाती है और इस तरह बहुत-से योद्धाओंका समूह जुट गया है ॥ १ ॥

नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा ।
प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद् दृष्टविक्रमम् ॥ २ ॥
हमलोगोंने सदा अपनी सेनाका आदर-सत्कार किया है तथा वह हमारे प्रति सदासे ही अनुरक्त भी है। हमारे सैनिक युद्धकी कलामें बढ़े-चढ़े हैं। हमारा सैन्यसमुदाय देखनेमें अद्भुत जान पड़ता है तथा इस सेनामें वे ही लोग चुन-चुनकर रखे गये हैं जिनका पराक्रम पहलेसे ही देख लिया गया है ॥ २ ॥

नातिवृद्धमबालं च नाकृशं नातिपीवरम् ।
लघुवृत्तायतप्रायं सारगात्रमनामयम् ॥ ३ ॥
इसमें न तो कोई अधिक बूढ़ा है, न बालक है, न अधिक दुबला है और न बहुत ही मोटा है। उनका शरीर हलका, सुडौल तथा प्रायः लंबा है। शरीरका एक-एक अवयव सारवान् (सबल) तथा सभी सैनिक नीरोग एवं स्वस्थ हैं ॥ ३ ॥

आत्तसंनाहसंछन्नं बहुशस्त्रपरिच्छदम् ।
शस्त्रग्रहणविद्यासु बह्वीषु परिनिष्ठितम् ॥ ४ ॥
इन सैनिकोंका शरीर बँधे हुए कवचसे आच्छादित है। इनके पास शस्त्र आदि आवश्यक सामग्रियोंकी बहुतायत है। ये सभी सैनिक शस्त्रग्रहणसम्बन्धी बहुत-सी विद्याओंमें प्रवीण हैं ॥ ४ ॥

आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते ।
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् ॥ ५ ॥

चढ़ने, उतरने, फैलने, कूद-कूदकर चलने, भली-भाँति प्रहार करने, युद्धके लिये जाने और अवसर देखकर पलायन करनेमें भी कुशल हैं ।। ५ ।।

नागेष्वश्वेषु बहुशो रथेषु च परीक्षितम् ।
परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम् ।। ६ ।।
हाथियों, घोड़ों तथा रथोंपर बैठकर युद्ध करनेकी कलामें सब लोगोंकी परीक्षा ली जा चुकी है और परीक्षा लेनेके पश्चात् उन्हें यथायोग्य वेतन दिया गया है ।। ६ ।।

न गोष्ठ्या नोपकारेण न सम्बन्धनिमित्ततः ।
नानाहूतं नाप्यभृतं मम सैन्यं बभूव ह ।। ७ ।।
हमने किसीको भी गोष्ठीद्वारा बहकाकर, उपकार करके अथवा किसी सम्बन्धके कारण सेनामें भर्ती नहीं किया है। इनमें ऐसा भी कोई नहीं है जिसे बुलाया न गया हो अथवा जिसे बेगारमें पकड़कर लाया गया हो। मेरी सारी सेनाकी यही स्थिति है ।। ७ ।।

कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् ।
कृतमानोपचारं च यशस्वि च मनस्वि च ।। ८ ।।
इसमें सभी लोग कुलीन, श्रेष्ठ, हृष्ट-पुष्ट, उद्धण्डताशून्य, पहलेसे सम्मानित, यशस्वी तथा मनस्वी हैं ।।

सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्बहुभिः पुण्यकर्मभिः ।
लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ।। ९ ।।
तात! हमारे मन्त्री तथा अन्य बहुतेरे प्रमुख कार्यकर्ता जो पुण्यात्मा, लोकपालोंके समान पराक्रमी और मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं, सदा इस सेनाका पालन करते आये हैं ।। ९ ।।

बहुभिः पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रियचिकीर्षुभिः ।
अस्मानभिसृतैः कामात् सबलैः सपदानुगैः ।। १० ।।
हमारा प्रिय करनेकी इच्छावाले तथा सेना और अनुचरोंसहित स्वेच्छासे ही हमारे पक्षमें आये हुए बहुत-से भूपालगण भी इसकी रक्षामें तत्पर रहते हैं ।।

महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः ।
अपक्षैः पक्षिसंकाशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ।। ११ ।।
सम्पूर्ण दिशाओंसे बहकर आयी हुई नदियोंसे परिपूर्ण होनेवाले महासागरके समान हमारी यह सेना अगाध और अपार है। पक्षरहित एवं पक्षियोंके समान तीव्र वेगसे चलनेवाले रथों और घोड़ोंसे यह भरी हुई है ।। ११ ।।

प्रभिन्नकरटैश्चैव द्विरदैरावृतं महत् ।
यदहन्यत मे सैन्यं किमन्यद् भागधेयतः ।। १२ ।।
गण्डस्थलसे मद बहानेवाले गजराजोंद्वारा आवृत यह मेरी विशाल वाहिनी यदि शत्रुओंद्वारा मारी गयी है तो इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ।। १२ ।।

योधाक्षय्यजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गणम् ।

क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ॥ १३ ॥ ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम् । वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् ॥ १४ ॥ द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् । जलसंधमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम् ॥ १५ ॥ संजय! मेरी सेना भयंकर समुद्रके समान जान पड़ती है। योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं, वाहन ही इसकी तरंगमालाएँ हैं, क्षेपणीय, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र-शस्त्र इसमें मछलियोंके समान भरे हुए हैं। ध्वजा और आभूषणोंके समुदाय इसके भीतर रत्नोंके समान संचित हैं। दौड़ते हुए वाहन ही वायुके वेग हैं, जिनसे यह सैन्यसमुद्र कम्पित एवं क्षुब्ध-सा जान पड़ता है। द्रोणाचार्य ही इसकी पातालतक फैली हुई गहराई है। कृतवर्मा इसमें महान् ह्रदके समान है, जलसंध विशाल ग्राह है और कर्णरूपी चन्द्रमाके उदयसे यह सदा उद्वेलित होता रहता है ॥ १३—१५ ॥ गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे । संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम् ॥ १६ ॥ तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि । सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय ॥ १७ ॥ संजय! ऐसे मेरे सैन्यरूपी महासागरका वेगपूर्वक भेदन करके जब पाण्डवश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन तथा सात्वतवंशी उदार महारथी युयुधान एकमात्र रथकी सहायतासे इसके भीतर घुस गये, तब मैं अपनी सेनाके शेष रहनेकी आशा नहीं देखता हूँ ॥ १६-१७ ॥ तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वातीव तरस्विनौ । सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ॥ १८ ॥ किं नु वा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः । दारुणैकायने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ॥ १९ ॥ उन दोनों अत्यन्त वेगशाली वीरोंको वहाँ सबका उल्लंघन करके घुसे हुए देख तथा सिन्धुराज जयद्रथको गाण्डीवसे छूटे हुए बाणोंकी सीमामें उपस्थित पाकर कालप्रेरित कौरवोंने वहाँ कौन-सा कार्य किया? उस दारुण संहारके समय, जहाँ मृत्युके सिवा दूसरी कोई गति नहीं थी, किस प्रकार उन्होंने कर्तव्यका निश्चय किया? ॥ १८-१९ ॥ ग्रस्तान् हि कौरवान् मन्ये मृत्युना तात संगतान् । विक्रमोऽपि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै ॥ २० ॥ तात! मैं युद्धस्थलमें एकत्र हुए कौरवोंको कालका ग्रास ही मानता हूँ; क्योंकि रणक्षेत्रमें उनका पराक्रम भी पहले-जैसा नहीं दिखायी देता है ॥ २० ॥ अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ ।

न च वारयिता कश्चित् तयोरस्तीह संजय ॥ २१ ॥ संजय! श्रीकृष्ण और अर्जुन बिना कोई क्षति उठाये युद्धस्थलमें मेरी सेनाके भीतर घुस गये; परंतु इसमें कोई भी वीर उन दोनोंको रोकनेवाला न निकला ॥ २१ ॥ भृताश्च बहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः । वेतनेन यथायोगं प्रियवादेन चापरे ॥ २२ ॥ हमने दूसरे बहुत-से महारथी योद्धाओंकी परीक्षा करके ही उन्हें सेनामें भर्ती किया है और यथायोग्य वेतन देकर तथा प्रिय वचन बोलकर उनका सत्कार किया है ॥ २२ ॥ असत्कारभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते । कर्मणा ह्यनुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम् ॥ २३ ॥ तात! मेरी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे अनादरपूर्वक रखा गया हो। सबको उनके कार्यके अनुरूप ही भोजन और वेतन प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ न चायोधोऽभवत् कश्चिन्मम सैन्ये तु संजय । अल्पदानभृतस्तात तथा चाभृतको नरः ॥ २४ ॥ तात संजय! मेरी सेनामें ऐसा एक भी योद्धा नहीं रहा होगा जिसे थोड़ा वेतन दिया जाता हो अथवा बिना वेतनके ही रखा गया हो ॥ २४ ॥ पूजितो हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मया । तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सबान्धवैः ॥ २५ ॥ तात! मैंने, मेरे पुत्रोंने तथा कुटुम्बीजनों एवं बन्धु-बान्धवोंने भी सभी सैनिकोंका यथाशक्ति दान, मान और आसन आदि देकर सत्कार किया है ॥ २५ ॥ ते च प्राप्यैव संग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना । शैनेयेन परामृष्टाः किमन्यद् भागधेयतः ॥ २६ ॥ तथापि सव्यसाची अर्जुनने संग्रामभूमिमें पहुँचते ही उन सबको पराजित कर दिया है और सात्यकिने भी उन्हें कुचल डाला है। इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ २६ ॥ रक्ष्यते यश्च संग्रामे ये च संजय रक्षिणः । एकः साधारणः पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ॥ २७ ॥ संजय! संग्राममें जिसकी रक्षा की जाती है और जो लोग रक्षक हैं, उन रक्षकोंसहित रक्षणीय पुरुषके लिये एकमात्र साधारण मार्ग रह गया है पराजय ॥ २७ ॥ अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् । पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ २८ ॥ अर्जुनको समरांगणमें सिन्धुराजके सामने खड़ा देख अत्यन्त मोहग्रस्त हुए मेरे पुत्रने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया? ॥ २८ ॥ सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् ।

किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ।। २९ ।। सात्यकिको रणक्षेत्रमें निर्भय-सा प्रवेश करते देख दुर्योधनने उस समयके लिये कौन-सा कर्तव्य उचित माना? ।। २९ ।। सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथिसत्तमौ । दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ।। ३० ।। सम्पूर्ण शस्त्रोंकी पहुँचसे परे होकर जब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकि और अर्जुन मेरी सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब उन्हें देखकर मेरे पुत्रोंने युद्धस्थलमें किस प्रकार धैर्य धारण किया? ।। ३० ।। दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् । शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३१ ।। मैं समझता हूँ कि अर्जुनके लिये रथपर बैठे हुए दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको तथा शिनिप्रवर सात्यकिको देखकर मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ।। ३१ ।। दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनैन च । पलायमानांश्च कुरून् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३२ ।। सात्यकि और अर्जुनको सेना लाँघकर जाते और कौरव-सैनिकोंको युद्धस्थलसे भागते देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे ।। ३२ ।। विद्रुतान् रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान् द्विषज्जये । पलायनकृतोत्साहान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३३ ।। मेरे मनमें यह बात आती है कि अपने रथियोंको शत्रु-विजयकी ओरसे उत्साहशून्य होकर भागते और भागनेमें ही बहादुरी दिखाते देख मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ।। ३३ ।। शून्यान् कृतान् रथोपस्थान् सात्वतेनार्जुनैन च । हतांश्च योधन् संदृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३४ ।। सात्यकि और अर्जुनने हमारी रथोंकी बैठकें सूनी कर दी हैं और योद्धाओंको मार गिराया है, यह देखकर मैं सोचता हूँ कि मेरे पुत्र बहुत दुःखी हो गये होंगे ।। ३४ ।। व्यश्वनागरथान् दृष्ट्वा तत्र वीरान् सहस्रशः । धावमानान् रणे व्यग्रान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३५ ।। सहस्रों वीरोंको वहाँ युद्धके मैदानमें घोड़े, रथ और हाथियोंसे रहित एवं उद्विग्न होकर भागते देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ।। ३५ ।। महानागान् विद्रवतो दृष्ट्वार्जुनशराहतान् । पतितान् पततश्चान्यान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३६ ।। अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर बड़े-बड़े गजराजोंको भागते, गिरते और गिरे हुए देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ।। ३६ ।। विहीनांश्च कृतानश्वान् विरथांश्च कृतान् नरान् ।

तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३७ ॥ सात्यकि और अर्जुनने घोड़ोंको सवारोंसे हीन और मनुष्योंको रथसे वंचित कर दिया है। यह देख-सुनकर मेरे पुत्र शोकमें डूब रहे होंगे ॥ ३७ ॥ ह्यौघान् निहतान् दृष्ट्वा द्रवमाणांस्ततस्ततः । रणे माधवपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३८ ॥ रणक्षेत्रमें सात्यकि और अर्जुनद्वारा मारे गये तथा इधर-उधर भागते हुए अश्वसमूहोंको देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकदग्ध हो रहे होंगे ॥ ३८ ॥ पत्तिसंघान् रणे दृष्ट्वा धावमानांश्च सर्वशः । निराशा विजये सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३९ ॥ पैदल सिपाहियोंको रणक्षेत्रमें सब ओर भागते देख मैं समझता हूँ, मेरे सभी पुत्र विजयसे निराश हो शोक कर रहे होंगे ॥ ३९ ॥ द्रोणस्य समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ । क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ४० ॥ मेरे मनमें यह बात आती है कि किसीसे पराजित न होनेवाले दोनों वीर अर्जुन और सात्यकिको क्षणभरमें द्रोणाचार्यकी सेनाका उल्लंघन करते देख मेरे पुत्र शोकाकुल हो गये होंगे ॥ ४० ॥ सम्मूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनंजयौ । प्रविष्टौ मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ ॥ ४१ ॥ तात! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुनके सात्यकिसहित अपनी सेनामें घुसनेका समाचार सुनकर मैं अत्यन्त मोहित हो रहा हूँ ॥ ४१ ॥ तस्मिन् प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे । भोजानीकं व्यतिक्रान्ते किमकुर्वत कौरवाः ॥ ४२ ॥ शिनिप्रवर महारथी सात्यकि जब कृतवर्माकी सेनाको लाँघकर कौरवी सेनामें प्रविष्ट हो गये तब कौरवोंने क्या किया? ॥ ४२ ॥ तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु । कथं युद्धमभूत् तत्र तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४३ ॥ संजय! जब द्रोणाचार्यने समरभूमिमें पूर्वोक्त प्रकारसे पाण्डवोंको रोक दिया, तब वहाँ किस प्रकार युद्ध हुआ? यह सब मुझे बताओ ॥ ४३ ॥ द्रोणो हि बलवान् श्रेष्ठः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । पञ्चालास्ते महेष्वासं प्रत्यविध्यन् कथं रणे ॥ ४४ ॥ बद्धवैरास्ततो द्रोणे धनंजयजयैषिणः ।

द्रोणाचार्य अस्त्रविद्यामें निपुण, युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले, बलवान् एवं श्रेष्ठ वीर हैं। पांचाल-सैनिकोंने उस समय रणक्षेत्रमें महाधनुर्धर द्रोणको किस प्रकार घायल किया? क्योंकि वे द्रोणाचार्यसे वैर बाँधकर अर्जुनकी विजयकी अभिलाषा रखते थे ॥ ४४ १/२ ॥
भारद्वाजसुतस्तेषु दृढवैरो महारथः ॥ ४५ ॥
अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति ।
तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि संजय ॥ ४६ ॥
संजय! भरद्वाजके पुत्र महारथी अश्वत्थामा भी पांचालोंसे दृढ़तापूर्वक वैर बाँधे हुए थे। अर्जुनने सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेके लिये जो-जो उपाय किया, वह सब मुझसे कहो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ॥

संजय उवाच

आत्मापराधात् सम्भूतं व्यसनं भरतर्षभ ।
प्राप्य प्राकृतवद् वीर न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ४७ ॥
संजयने कहा— भरतश्रेष्ठ! यह सारी विपत्ति आपको अपने ही अपराधसे प्राप्त हुई है। वीर! इसे पाकर निम्न कोटिके मनुष्योंकी भाँति शोक न कीजिये ॥ ४७ ॥
पुरा यदुच्यसे प्राज्ञैः सुहृद्भिर्विदुरादिभिः ।
मा हार्षीः पाण्डवान् राजन्निति तन्न त्वया श्रुतम् ॥ ४८ ॥
पहले जब आपके बुद्धिमान् सुहृद् विदुर आदिने आपसे कहा था कि राजन्! आप पाण्डवोंके राज्यका अपहरण न कीजिये, तब आपने उनकी यह बात नहीं सुनी थी ॥ ४८ ॥
सुहृदां हितकामानां वाक्यं यो न शृणोति ह ।
स महत् व्यसनं प्राप्य शोचते वै यथा भवान् ॥ ४९ ॥
जो हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, वह भारी संकटमें पड़कर आपके ही समान शोक करता है ॥ ४९ ॥
याचितोऽसि पुरा राजन् दाशार्हेण शमं प्रति ।
न च तं लब्धवान् कामं त्वत्तः कृष्णो महायशाः ॥ ५० ॥
राजन्! दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पहले आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपकी ओरसे उन महायशस्वी श्रीकृष्णकी वह इच्छा पूरी नहीं की गयी ॥ ५० ॥
तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च ।
द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् ॥ ५१ ॥
तव जिह्ममभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान् प्रति ।
आर्तप्रलापांश्च बहून् मनुजाधिपसत्तम ॥ ५२ ॥
सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।

वासुदेवस्ततो युद्धं कुरूणामकरोन्महत् ।। ५३ ।। नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब यह जान लिया कि आप सर्वथा सद्गुणशून्य हैं, अपने पुत्रोंपर पक्षपात रखते हैं, धर्मके विषयमें आपके मनमें दुविधा बनी हुई है, पाण्डवोंके प्रति आपके हृदयमें डाह है, आप उनके प्रति कुटिलतापूर्ण मनसूबे बाँधते रहते हैं और व्यर्थ ही आर्त मनुष्योंके समान बहुत-सी बातें बनाते हैं, तब उन्होंने कौरव-पाण्डवोंके महान् युद्धका आयोजन किया ।। ५१—५३ ।। आत्मापराधात् सुमहान् प्राप्तस्ते विपुलः क्षयः । नैनं दुर्योधने दोषं कर्तुमर्हसि मानद ।। ५४ ।। मानद! अपने ही अपराधसे आपके सामने यह महान् जनसंहार प्राप्त हुआ है। आपको यह सारा दोष दुर्योधनपर नहीं मढ़ना चाहिये ।। ५४ ।। न हि ते सुकृतं किंचिदादौ मध्ये च भारत । दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजयः ।। ५५ ।। भारत! मुझे तो आगे, पीछे या बीचमें आपका कोई भी शुभ कर्म नहीं दिखायी देता। इस पराजयकी जड़ आप ही हैं ।। ५५ ।। तस्मादवस्थितो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम् । शृणु युद्धं यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम् ।। ५६ ।। इसलिये स्थिर होकर और लोकके नियत स्वभावको जानकर देवासुर-संग्रामके समान भयंकर इस कौरव-पाण्डव-युद्धका यथार्थ वृत्तान्त सुनिये ।। ५६ ।। प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे । भीमसेनमुखाः पार्थाः प्रतियुर्वाहिनीं तव ।। ५७ ।। जब सत्यपराक्रमी सात्यकि कौरव-सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब भीमसेन आदि कुन्तीकुमारोंने आपकी विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया ।। ५७ ।। आगच्छतस्तान् सहसा क्रुद्धरूपान् सहानुगान् । दधारैको रणे पाण्डून् कृतवर्मा महारथः ।। ५८ ।। सेवकोंसहित कुपित होकर सहसा आक्रमण करनेवाले उन पाण्डववीरोंको रणक्षेत्रमें एकमात्र महारथी कृतवर्माने रोका ।। ५८ ।। यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम् । पाण्डुसैन्यं तथा संख्ये हार्दिक्यः समवारयत् ।। ५९ ।। जैसे उद्वेलित हुए महासागरको किनारेकी भूमि आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें कृतवर्माने पाण्डव-सेनाको रोक दिया ।। ५९ ।। तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम् । यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ।। ६० ।।

वहाँ हमने कृतवर्माका अद्भुत पराक्रम देखा। सारे पाण्डव एक साथ मिलकर भी समरांगणमें उसे लाँघ न सके ॥ ६० ॥

ततो भीमस्त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्माणमाशुगैः ।
शङ्खं दध्मौ महाबाहुर्हर्षयन् सर्वपाण्डवान् ॥ ६१ ॥
तदनन्तर महाबाहु भीमने तीन बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल करके समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए शंख बजाया ॥ ६१ ॥

सहदेवस्तु विंशत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः ।
शतेन नकुलश्चापि हार्दिक्यं समविध्यत ॥ ६२ ॥
सहदेवने बीस, धर्मराजने पाँच और नकुलने सौ बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६२ ॥

द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्च घटोत्कचः ।
धृष्टद्युम्नस्त्रिभिश्चापि कृतवर्माणमर्दयत् ॥ ६३ ॥
द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर, घटोत्कचने सात और धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६३ ॥

विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्च पञ्चभिः ।
शिखण्डी चैव हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ॥ ६४ ॥
पुनर्विव्याध विंशत्या सायकानां हसन्निव ।
विराट, द्रुपद और उनके पुत्र धृष्टद्युम्नने पाँच-पाँच बाणोंसे उसको घायल किया। फिर शिखण्डीने पहले पाँच बाणोंद्वारा चोट करके फिर हँसते हुए ही बीस बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६४ १/२ ॥

कृतवर्मा ततो राजन् सर्वतस्तान् महारथान् ॥ ६५ ॥
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा भीमं विव्याध सप्तभिः ।
धनुर्ध्वजं चास्य तथा रथाद् भूमावपातयत् ॥ ६६ ॥
राजन्! उस समय कृतवर्माने चारों ओर बाण चलाकर उन महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच बाणोंद्वारा बींध डाला और भीमसेनको सात बाणोंसे घायल कर दिया। फिर तत्काल ही उनके धनुष और ध्वजको काटकर रथसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६५-६६ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः ।
आजघानोरसि क्रुद्धः सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ६७ ॥
भीमसेनका धनुष कट जानेपर महारथी कृतवर्माने कुपित हो बड़ी उतावलीके साथ सत्तर पैने बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ ६७ ॥

स गाढविद्धो बलवान् हार्दिक्यस्य शरोत्तमैः ।
चचाल रथमध्यस्थः क्षितिकम्पे यथाचलः ॥ ६८ ॥

कृतवर्माके श्रेष्ठ बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हुए बलवान् भीमसेन रथके भीतर बैठे हुए ही भूकम्पके समय हिलनेवाले पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ६८ ॥ भीमसेनं तथा दृष्ट्वा धर्मराजपुरोगमाः । विसृजन्तः शरान् राजन् कृतवर्माणमर्दयन् ॥ ६९ ॥ राजन्! भीमसेनको वैसी अवस्थामें देखकर धर्मराज आदि महारथियोंने बाणोंकी वर्षा करके कृतवर्माको बड़ी पीड़ा दी ॥ ६९ ॥ तं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । विव्यधुः सायकैर्हृष्टा रक्षार्थं मारुतेर्मृधे ॥ ७० ॥ माननीय नरेश! हर्षमें भरे हुए पाण्डव-सैनिक भीमसेनकी रक्षाके लिये अपने रथसमूहद्वारा कृतवर्माको कोष्ठबद्ध-सा करके उसे युद्धस्थलमें अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे ॥ ७० ॥ प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः । शक्तिं जग्राह समरे हेमदण्डामयस्मयीम् ॥ ७१ ॥ इसी बीचमें महाबली भीमसेनने सचेत होकर समरांगणमें सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक लोहेकी शक्ति हाथमें ले ली ॥ ७१ ॥ चिक्षेप च रथात् तूर्णं कृतवर्मरथं प्रति । सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा ॥ ७२ ॥ कृतवर्माणमभितः प्रजज्वाल सुदारुणा । और शीघ्र ही उसे अपने रथसे कृतवर्माके रथपर चला दिया। भीमसेनके हाथोंसे छूटी हुई, केंचुलसे निकले हुए सर्पके समान वह भयंकर शक्ति कृतवर्माके समीप जाकर प्रज्वलित हो उठी ॥ ७२ १/२ ॥ तामापतन्तीं सहसा युगान्ताग्निसमप्रभाम् ॥ ७३ ॥ द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निजघान द्विधा तदा । उस समय अपने ऊपर आती हुई प्रलयकालकी अग्निके समान उस शक्तिको सहसा दो बाण मारकर कृतवर्माने उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ७३ १/२ ॥ सा छिन्ना पतिता भूमौ शक्तिः कनकभूषणा ॥ ७४ ॥ द्योतयन्ती दिशो राजन् महोल्केव नभश्च्युता । राजन्! सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई वह सुवर्णभूषित शक्ति कटकर आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ७४ १/२ ॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा भीमश्चुक्रोध वै भृशम् ॥ ७५ ॥ ततोऽन्यद् धनुरादाय वेगवत् सुमहास्वनम् । भीमसेनो रणे क्रुद्धो हार्दिक्यं समवारयत् ॥ ७६ ॥

अपनी शक्तिको कटी हुई देख भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बड़ी भारी टंकारध्वनि करनेवाले दूसरे वेगशाली धनुषको हाथमें लेकर समरांगणमें कुपित हो कृतवर्माका सामना किया ॥ ७५-७६ ॥ अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च ॥ ७७ ॥ राजन्! आपकी ही कुमन्त्रणासे वहाँ भयंकर बलशाली भीमसेनने कृतवर्माकी छातीमें पाँच बाण मारे ॥ ७७ ॥ भोजस्तु क्षतसर्वाङ्गो भीमसेनेन मारिष । रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे ॥ ७८ ॥ माननीय नरेश! भीमसेनने उन बाणोंद्वारा कृतवर्माके सम्पूर्ण अंगोंको क्षत-विक्षत कर दिया। वह रणांगणमें खूनसे लथपथ हो खिले हुए लाल फूलोंवाले अशोकवृक्षके समान सुशोभित होने लगा ॥ ७८ ॥ ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव । अभिहत्य दृढं युद्धे तान् सर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ ७९ ॥ त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान् महारथान् । तदनन्तर उस महाधनुर्धरने क्रोधमें भरकर हँसते हुए ही तीन बाणोंद्वारा भीमसेनको गहरी चोट पहुँचाकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला ॥ ७९ १/२ ॥ तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ॥ ८० ॥ शिखण्डिनस्ततः क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथः । धनुश्चिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वतः ॥ ८१ ॥ तब उन महारथियोंने भी कृतवर्माको सात-सात बाण मारे। उस समय क्रोधमें भरे हुए महारथी कृतवर्माने हँसते हुए ही समरांगणमें एक क्षुरप्रद्वारा शिखण्डीका धनुष काट डाला ॥ ८०-८१ ॥ शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वरः । असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ॥ ८२ ॥ धनुष कट जानेपर शिखण्डीने तुरंत ही कुपित हो उस युद्धस्थलमें सौ चन्द्रमाओंके चिह्नसे युक्त चमकीली ढाल और तलवार हाथमें ले ली ॥ ८२ ॥ भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम् । तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति ॥ ८३ ॥ उसने स्वर्णभूषित विशाल ढालको घुमाकर कृतवर्माके रथपर वह तलवार दे मारी ॥ ८३ ॥ स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन् महानसिः ।

अभ्यगाद् धरणीं राजंश्च्युतं ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ८४ ॥ राजन्! वह महान् खड्ग कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काटकर आकाशसे टूटे हुए तारेके समान धरतीमें समा गया ॥ ८४ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणं महारथाः । विव्यधुः सायकैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे ॥ ८५ ॥ इसी समय पाण्डव महारथियोंने युद्धमें जल्दी-जल्दी हाथ चलानेवाले कृतवर्माको अपने बाणोंद्वारा भारी चोट पहुँचायी ॥ ८५ ॥ अथान्यद् धनुरादाय त्यक्त्वा तच्च महद् धनुः । विशीर्णं भरतश्रेष्ठः हार्दिक्यः परवीरहा ॥ ८६ ॥ विव्याध पाण्डवान् युद्धे त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभिः पञ्चभिरेव च ॥ ८७ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कृतवर्माने टूटे हुए उस विशाल धनुषको त्यागकर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और युद्धमें पाण्डवोंको तीन-तीन बाण मारकर घायल कर दिया। साथ ही शिखण्डीको भी तीन और पाँच बाणोंसे बींध डाला ॥ ८६-८७ ॥ धनुरन्यत् समादाय शिखण्डी तु महायशाः । अवारयन् कूर्मनखैराशुगैर्हृदिकामजम् ॥ ८८ ॥ तत्पश्चात् महायशस्वी शिखण्डीने भी दूसरा धनुष लेकर कछुओंके नखोंके समान धारवाले बाणोंद्वारा कृतवर्माका सामना किया ॥ ८८ ॥ ततः क्रुद्धो रणे राजन् हृदिकस्यात्मसम्भवः । अभिदुद्राव वेगेन याज्ञसेनिं महारथम् ॥ ८९ ॥ भीष्मस्य समरे राजन् मृत्योर्हेतुं महात्मनः । विदर्शयन् बलं शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ९० ॥ राजन्! जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें कुपित हुए शूरवीर कृतवर्माने समरांगणमें महात्मा भीष्मकी मृत्युका कारण बने हुए महारथी शिखण्डीपर अपने बलका प्रदर्शन करते हुए बड़े वेगसे धावा किया ॥ ८९-९० ॥ तौ दिशां गजसंकाशौ ज्वलिताविव पावकौ । समापेततुरन्योन्यं शरसङ्घैररिंदमौ ॥ ९१ ॥ प्रज्वलित अग्नियोंके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर अपने बाणसमूहोंद्वारा दो दिग्गजोंके समान एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ ९१ ॥ विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे संदधानौ च सायकान् । विसृजन्तौ च शतशो गभस्तीनिव भास्वरौ ॥ ९२ ॥

जैसे दो सूर्य पृथक्-पृथक् अपनी किरणोंका विस्तार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाते और उनपर सैकड़ों बाणोंका संधान करके छोड़ते थे ।।
तापयन्तौ शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं तौ महारथौ ।
युगान्तप्रतिमौ वीरौ रेजतुर्भास्कराविव ।। ९३ ।।
अपने पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको संताप देते हुए वे दोनों महारथी वीर प्रलयकालके दो सूर्योंके समान शोभा पा रहे थे ।। ९३ ।।
कृतवर्मा च समरे याज्ञसेनिं महारथम् ।
विद्वेषुभिस्त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभिः ।। ९४ ।।
कृतवर्मोने समरांगणमें महारथी शिखण्डीको पहले तिहत्तर बाणोंसे घायल करके फिर सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ।। ९४ ।।
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ।। ९५ ।।
उन बाणोंकी गहरी चोट खाकर शिखण्डी व्यथित एवं मूर्च्छित हो धनुष-बाण त्यागकर रथकी बैठकमें बैठ गया ।। ९५ ।।
तं विषण्णं रणे दृष्ट्वा तावकाः पुरुषर्षभ ।
हार्दिक्यं पूजयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ।। ९६ ।।
नरश्रेष्ठ! रणक्षेत्रमें शिखण्डीको विषादग्रस्त देख आपके सैनिक कृतवर्माकी प्रशंसा करने और वस्त्र हिलाने लगे ।। ९६ ।।
शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यशरपीडितम् ।
अपोवाह रणाद् यन्ता त्वरमाणो महारथम् ।। ९७ ।।
महारथी शिखण्डीको कृतवर्माके बाणोंसे पीड़ित जान सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया ।। ९७ ।।
सादितं तु रथोपस्थे दृष्ट्वा पार्थाः शिखण्डिनम् ।
परिवव्रू रथैस्तूर्णं कृतवर्माणमाहवे ।। ९८ ।।
कुन्तीकुमारोंने शिखण्डीको रथके पिछले भागमें बेसुध होकर बैठा देख तुरंत ही कृतवर्माको रणभूमिमें अपने रथोंद्वारा चारों ओरसे घेर लिया ।। ९८ ।।
तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथः ।
यदेकः समरे पार्थान् वारयामास सानुगान् ।। ९९ ।।
वहाँ महारथी कृतवर्माने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम प्रकट किया। उसने अकेले होनेपर भी सेवकोंसहित समस्त पाण्डवोंका समरभूमिमें सामना किया ।। ९९ ।।
पार्थान् जित्वाजयच्चेदीन् पञ्चालान् सृञ्जयानपि ।
केकयांश्च महावीर्यान् कृतवर्मा महारथः ।। १०० ।।

महारथी कृतवर्माने पाण्डवोंको जीतकर चेदिदेशीय सैनिकोंको परास्त किया, फिर पांचालों, सृंजयों और महापराक्रमी केकयोंको भी हरा दिया ॥ १०० ॥

ते वध्यमानाः समरे हार्दिक्येन स्म पाण्डवाः । इतश्चेतश्च धावन्तो नैव चक्रुर्धृतिं रणे ॥ १०१ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके बाणोंकी मार खाकर पाण्डव-सैनिक इधर-उधर भागने लगे। वे रणभूमिमें कहीं भी स्थिर न हो सके ॥ १०१ ॥

जित्वा पाण्डुसुतान् युद्धे भीमसेनपुरोगमान् । हार्दिक्यः समरेऽतिष्ठद् विधूम इव पावकः ॥ १०२ ॥

युद्धमें भीमसेन आदि पाण्डवोंको जीतकर कृतवर्मा उस रणक्षेत्रमें धूमरहित अग्निके समान शोभा पाता हुआ खड़ा था ॥ १०२ ॥

ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः । विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरार्दिताः ॥ १०३ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके द्वारा खदेड़े गये और उसकी बाण-वर्षासे पीड़ित हुए पूर्वोक्त सभी महारथियोंने युद्धसे मुँह मोड़ लिया ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे कृतवर्मपराक्रमे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेश तथा कृतवर्माका पराक्रमविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध

संजय उवाच

शृणुष्वैकमना राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
द्राव्यमाणे बले तस्मिन् हार्दिक्येन महात्मना ॥ १ ॥
लज्जयावनते चापि प्रहृष्टैश्चापि तावकैः ।
द्वीपो य आसीत् पाण्डूनामगाधे गाधमिच्छताम् ॥ २ ॥

संजय कहते हैं—राजन्! आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे हैं, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनिये। महामना कृतवर्माके द्वारा खदेड़ी जानेके कारण जब पाण्डव-सेना लज्जासे नतमस्तक हो गयी और आपके सैनिक हर्षसे उल्लसित हो उठे, उस समय अथाह सैन्य-समुद्रमें थाह पानेकी इच्छावाले पाण्डव-सैनिकोंके लिये जो द्वीप बनकर आश्रयदाता हुआ (उस सात्यकिका पराक्रम श्रवण कीजिये) ॥ १-२ ॥

श्रुत्वा स निनदं भीमं तावकानां महाहवे ।
शैनेयस्त्वरितो राजन् कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ३ ॥

राजन्! उस महासमरमें आपके सैनिकोंका भयंकर सिंहनाद सुनकर सात्यकिने तुरंत ही कृतवर्मापर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वितः ।
हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम् ॥ ४ ॥

उन्होंने क्रोध और अमर्षमें भरकर वहाँ सारथिसे कहा—‘सूत! तुम मेरे उत्तम रथको कृतवर्माके सामने ले चलो ॥ ४ ॥

कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये ह्यमर्षितः ।
एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति ॥ ५ ॥

‘देखो, वह अमर्षयुक्त होकर पाण्डव-सेनामें संहार मचा रहा है। सारथे! इसे जीतकर मैं पुनः अर्जुनके पास चलूँगा' ॥ ५ ॥

एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते ।
निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ६ ॥

महामते! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथि पलक गिरते-गिरते रथ लेकर कृतवर्माके पास जा पहुँचा ॥ ६ ॥

कृतवर्मा तु हार्दिक्यः शैनेयं निशितैः शरैः ।