भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

न च वारयिता कश्चित् तयोरस्तीह संजय ॥ २१ ॥ संजय! श्रीकृष्ण और अर्जुन बिना कोई क्षति उठाये युद्धस्थलमें मेरी सेनाके भीतर घुस गये; परंतु इसमें कोई भी वीर उन दोनोंको रोकनेवाला न निकला ॥ २१ ॥ भृताश्च बहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः । वेतनेन यथायोगं प्रियवादेन चापरे ॥ २२ ॥ हमने दूसरे बहुत-से महारथी योद्धाओंकी परीक्षा करके ही उन्हें सेनामें भर्ती किया है और यथायोग्य वेतन देकर तथा प्रिय वचन बोलकर उनका सत्कार किया है ॥ २२ ॥ असत्कारभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते । कर्मणा ह्यनुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम् ॥ २३ ॥ तात! मेरी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे अनादरपूर्वक रखा गया हो। सबको उनके कार्यके अनुरूप ही भोजन और वेतन प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ न चायोधोऽभवत् कश्चिन्मम सैन्ये तु संजय । अल्पदानभृतस्तात तथा चाभृतको नरः ॥ २४ ॥ तात संजय! मेरी सेनामें ऐसा एक भी योद्धा नहीं रहा होगा जिसे थोड़ा वेतन दिया जाता हो अथवा बिना वेतनके ही रखा गया हो ॥ २४ ॥ पूजितो हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मया । तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सबान्धवैः ॥ २५ ॥ तात! मैंने, मेरे पुत्रोंने तथा कुटुम्बीजनों एवं बन्धु-बान्धवोंने भी सभी सैनिकोंका यथाशक्ति दान, मान और आसन आदि देकर सत्कार किया है ॥ २५ ॥ ते च प्राप्यैव संग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना । शैनेयेन परामृष्टाः किमन्यद् भागधेयतः ॥ २६ ॥ तथापि सव्यसाची अर्जुनने संग्रामभूमिमें पहुँचते ही उन सबको पराजित कर दिया है और सात्यकिने भी उन्हें कुचल डाला है। इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ २६ ॥ रक्ष्यते यश्च संग्रामे ये च संजय रक्षिणः । एकः साधारणः पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ॥ २७ ॥ संजय! संग्राममें जिसकी रक्षा की जाती है और जो लोग रक्षक हैं, उन रक्षकोंसहित रक्षणीय पुरुषके लिये एकमात्र साधारण मार्ग रह गया है पराजय ॥ २७ ॥ अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् । पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ २८ ॥ अर्जुनको समरांगणमें सिन्धुराजके सामने खड़ा देख अत्यन्त मोहग्रस्त हुए मेरे पुत्रने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया? ॥ २८ ॥ सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् ।