भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 773

किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ।। २९ ।। सात्यकिको रणक्षेत्रमें निर्भय-सा प्रवेश करते देख दुर्योधनने उस समयके लिये कौन-सा कर्तव्य उचित माना? ।। २९ ।। सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथिसत्तमौ । दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ।। ३० ।। सम्पूर्ण शस्त्रोंकी पहुँचसे परे होकर जब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकि और अर्जुन मेरी सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब उन्हें देखकर मेरे पुत्रोंने युद्धस्थलमें किस प्रकार धैर्य धारण किया? ।। ३० ।। दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् । शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३१ ।। मैं समझता हूँ कि अर्जुनके लिये रथपर बैठे हुए दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको तथा शिनिप्रवर सात्यकिको देखकर मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ।। ३१ ।। दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनैन च । पलायमानांश्च कुरून् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३२ ।। सात्यकि और अर्जुनको सेना लाँघकर जाते और कौरव-सैनिकोंको युद्धस्थलसे भागते देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे ।। ३२ ।। विद्रुतान् रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान् द्विषज्जये । पलायनकृतोत्साहान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३३ ।। मेरे मनमें यह बात आती है कि अपने रथियोंको शत्रु-विजयकी ओरसे उत्साहशून्य होकर भागते और भागनेमें ही बहादुरी दिखाते देख मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ।। ३३ ।। शून्यान् कृतान् रथोपस्थान् सात्वतेनार्जुनैन च । हतांश्च योधन् संदृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३४ ।। सात्यकि और अर्जुनने हमारी रथोंकी बैठकें सूनी कर दी हैं और योद्धाओंको मार गिराया है, यह देखकर मैं सोचता हूँ कि मेरे पुत्र बहुत दुःखी हो गये होंगे ।। ३४ ।। व्यश्वनागरथान् दृष्ट्वा तत्र वीरान् सहस्रशः । धावमानान् रणे व्यग्रान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३५ ।। सहस्रों वीरोंको वहाँ युद्धके मैदानमें घोड़े, रथ और हाथियोंसे रहित एवं उद्विग्न होकर भागते देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ।। ३५ ।। महानागान् विद्रवतो दृष्ट्वार्जुनशराहतान् । पतितान् पततश्चान्यान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।। ३६ ।। अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर बड़े-बड़े गजराजोंको भागते, गिरते और गिरे हुए देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ।। ३६ ।। विहीनांश्च कृतानश्वान् विरथांश्च कृतान् नरान् ।