महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'दुर्योधनका हित चाहनेवाले और विषके समान घातक उन प्रहारकुशल किरात-योद्धाओंके साथ भी संग्राम करूँगा, जिनका राजा दुर्योधनने सदा ही लालन-पालन किया है ।। ४९ १/२ ।। शकैश्चापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमैः ।। ५० ।। अग्निकल्पैर्दुराधर्षैः प्रदीप्तैरिव पावकैः । 'प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष एवं इन्द्रके समान पराक्रमी शकोंके साथ भी आज मैं भिड़ जाऊँगा ।। ५० १/२ ।। तथान्यैर्विविधैर्योधैः कालकल्पैर्दुरासदैः ।। ५१ ।। समेष्यामि रणे राजन् बहुभिर्युद्धदुर्मदैः । 'राजन्! इनके सिवा और भी जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक युद्धदुर्मद, कालके तुल्य भयंकर तथा दुर्जय योद्धा हैं, रणक्षेत्रमें उन सबका सामना करूँगा ।। ५१ १/२ ।। तस्माद् वै वाजिनो मुख्या विश्रान्ताः शुभलक्षणाः ।। ५२ ।। उपावृत्ताश्च पीताश्च पुनर्युज्यन्तु मे रथे । 'इसलिये उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ घोड़े, जो विश्राम कर चुके हों, जिन्हें टहलाया गया हो और पानी भी पिला दिया गया हो, पुनः मेरे रथमें जोते जायँ' ।। ५२ १/२ ।।
संजय उवाच
तस्य सर्वानुपासांगान् सर्वोपकरणानि च ।। ५३ ।। रथे चास्थापयद् राजा शस्त्राणि विविधानि च । **संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने सात्यकिके रथपर भरे हुए तरकसों, समस्त उपकरणों तथा भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको रखवा दिया ।। ५३ १/२ ।। ततस्तान् सर्वतो युक्तान् सदश्वांश्चतुरो जनाः ।। ५४ ।। रसवत् पाययामासुः पानं मदसमीरणम् । तदनन्तर सब प्रकारसे सुशिक्षित उन चारों उत्तम घोड़ोंको सेवकोंने मदमत्त बना देनेवाला रसीला पेय पदार्थ पिलाया ।। ५४ १/२ ।। पीतोपवृत्तान् स्नातांश्च जग्धान्नान् समलंकृतान् ।। ५५ ।। विनीतशल्यांस्तुरगांश्चतुरो हेममालिनः । तान् युक्तान् रुक्मवर्णाभान् विनीतान् शीघ्रगामिनः ।। ५६ ।। संहृष्टमनसोऽव्यग्रान् विधिवत्कल्पितान् रथे । महाध्वजेन सिंहेन हेमकेसरमालिना ।। ५७ ।।