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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 756

ब्राह्मणोंके आशीर्वाद पाकर तेजस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं मधुपर्कके अधिकारी

सात्यकिने कैलातक नामक मधुका पान किया। उसे पीते ही उनकी आँखें लाल

हो गयीं। मदसे नेत्र चंचल हो उठे, फिर उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर

वीरकांस्यपात्रका स्पर्श किया। उस समय प्रज्वलित अग्निके समान रथियोंमें

श्रेष्ठ सात्यकिका तेज दूना हो गया। उन्होंने बाणसहित धनुषको गोदमें लेकर

ब्राह्मणोंके मुखसे स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न कराकर कवच एवं आभूषण

धारण किये, फिर कुमारी कन्याओंने लावा, गन्ध तथा पुष्पमालाओंसे उनका

पूजन एवं अभिनन्दन किया ।। ६२—६५ ।।

युधिष्ठिरस्य चरणावभिवाद्य कृताञ्जलिः ।

तेन मूर्ध्न्युपाघ्रात आरुरोह महारथम् ।। ६६ ।।

इसके बाद सात्यकिने हाथ जोड़कर युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम किया और

युधिष्ठिरने उनका मस्तक सूँघा। फिर वे उस विशाल रथपर आरूढ़ हो

गये ।। ६६ ।।

ततस्ते वाजिनो हृष्टाः सुपुष्टाः वातरंहसः ।

अजय्या जैत्रमूहूस्तं विकुर्वाणाः स्म सैन्धवाः ।। ६७ ।।

तदनन्तर वे हृष्ट-पुष्ट वायुके समान वेगशाली एवं अजेय सिंधुदेशीय घोड़े

मदमत्त हो उस विजयशील रथको लेकर चल दिये ।। ६७ ।।

तथैव भीमसेनोऽपि धर्मराजेन पूजितः ।

प्रायात् सात्यकिना सार्धमभिवाद्य युधिष्ठिरम् ।। ६८ ।।

इसी प्रकार धर्मराजसे सम्मानित भीमसेन भी युधिष्ठिरको प्रणाम करके

सात्यकिके साथ चले ।। ६८ ।।

तौ दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तौ तव सेनामरिंदमौ ।

संयत्तास्तावकाः सर्वे तस्थुर्द्रोणपुरोगमाः ।। ६९ ।।

उन दोनों शत्रुदमन वीरोंको आपकी सेनामें प्रवेश करनेके लिये इच्छुक देख

द्रोणाचार्य आदि आपके सारे सैनिक सावधान होकर खड़े हो गये ।। ६९ ।।

संनद्धमनुगच्छन्तं दृष्ट्वा भीमं स सात्यकिः ।

अभिनन्द्याब्रवीद् वीरस्तदा हर्षकरं वचः ।। ७० ।।

उस समय भीमसेनको कवच आदिसे सुसज्जित होकर अपने पीछे आते

देख उनका अभिनन्दन करके वीर सात्यकिने उनसे यह हर्षवर्धक वचन कहा

— ।। ७० ।।

त्वं भीम रक्ष राजानमेतत् कार्यतमं हि ते ।

अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं बलम् ।। ७१ ।।