महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'भीमसेन! तुम राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो। यही तुम्हारे लिये सबसे महान् कार्य है। जिसे कालने राँधकर पका दिया है, इस कौरव-सेनाको चीरकर मैं भीतर प्रवेश कर जाऊँगा ।। ७१ ।।
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो राज्ञोऽभिरक्षणम् ।
जानीषे मम वीर्यं त्वं तव चाहमरिंदम ।। ७२ ।।
तस्माद् भीम निवर्तस्व मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
'शत्रुदमन वीर! इस समय और भविष्यमें भी राजाकी रक्षा करना ही श्रेयस्कर है। तुम मेरा बल जानते हो और मैं तुम्हारा। अतः भीमसेन! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो लौट जाओ ।। ७२ १/२ ।।
तथोक्तः सात्यकिं प्राह व्रज त्वं कार्यसिद्धये ।। ७३ ।।
अहं राज्ञः करिष्यामि रक्षां पुरुषसत्तम ।
सात्यकिके ऐसा कहनेपर भीमसेनने उनसे कहा—'अच्छा भैया! तुम कार्यसिद्धिके लिये आगे बढ़ो। पुरुषप्रवर! मैं राजाकी रक्षा करूँगा' ।। ७३ १/२ ।।
एवमुक्तः प्रत्युवाच भीमसेनं स माधवः ।। ७४ ।।
गच्छ गच्छ ध्रुवं पार्थ ध्रुवो हि विजयो मम ।
भीमसेनके ऐसा कहनेपर सात्यकिने उनसे कहा—'कुन्तीकुमार! तुम जाओ। निश्चय ही लौट जाओ। मेरी विजय अवश्य होगी ।। ७४ १/२ ।।
यन्मे गुणानुरक्तश्च त्वमद्य वशमास्थितः ।। ७५ ।।
निमित्तानि च धन्यानि यथा भीम वदन्ति माम् ।
निहते सैन्धवे पापे पाण्डवेन महात्मना ।। ७६ ।।
परिष्वजिष्ये राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
'भीमसेन! तुम जो मेरे गुणोंमें अनुरक्त होकर मेरे वशमें हो गये हो तथा इस समय दिखायी देनेवाले शुभ शकुन मुझे जैसी बात बता रहे हैं, इससे जान पड़ता है कि महात्मा अर्जुनके द्वारा पापी जयद्रथके मारे जानेपर मैं निश्चय ही लौटकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका आलिंगन करूँगा' ।। ७५-७६ १/२ ।।
एतावदुक्त्वा भीमं तु विसृज्य च महायशाः ।। ७७ ।।
सम्प्रैक्षत् तावकं सैन्यं व्याघ्रो मृगगणानिव ।
भीमसेनसे ऐसा कहकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् महायशस्वी सात्यकिने आपकी सेनाकी ओर उसी प्रकार देखा, जैसे बाघ मृगोंके झुंडकी ओर देखता है ।। ७७ १/२ ।।
तं दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तं सैन्यं तव जनाधिप ।। ७८ ।।
भूय एवाभवन्मूढं सुभृशं चाप्यकम्पत ।