महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रादुरासीत् कृते द्रोणे हर्षः सेनापतौ तदा ॥ ७ ॥
उस समय वाद्योंके घोष तथा शंखोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ द्रोणाचार्यके सेनापति बना लिये जानेपर सब लोगोंके हृदयमें महान् हर्ष प्रकट हुआ ॥ ७ ॥
ततः पुण्याहघोषेण स्वस्तिवादस्वनेन च ।
संस्तवैर्गीतशब्दैश्च सूतमागधवन्दिनाम् ॥ ८ ॥
जयशब्दैर्द्विजाग्र्याणां सुभगानर्तितैस्तथा ।
सत्कृत्य विधिना द्रोणं मेनिरे पाण्डवाञ्जितान् ॥ ९ ॥
पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, सूत, मागध और वन्दीजनोंके स्तोत्र, गीत तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके जय-जयकारके शब्दसे एवं नाचनेवाली स्त्रियोंके नृत्यसे द्रोणाचार्यका विधिवत् सत्कार करके कौरवोंने यह मान लिया कि अब पाण्डव पराजित हो गये ॥ ८-९ ॥
सैनापत्यं तु सम्प्राप्य भारद्वाजो महारथः ।
युयुत्सुर्व्यूह्य सैन्यानि प्रायात् तव सुतैः सह ॥ १० ॥
राजन्! महारथी द्रोणाचार्य सेनापतिक पद पाकर अपनी सेनाकी व्यूह-रचना करके आपके पुत्रोंको साथ ले युद्धके लिये उत्सुक हो आगे बढ़े ॥ १० ॥
सैन्धवश्च कलिङ्गश्च विकर्णश्च तवात्मजः ।
दक्षिणं पार्श्वमास्थाय समतिष्ठन्त दंशिताः ॥ ११ ॥
सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगनरेश और आपके पुत्र विकर्ण—ये तीनों उनके दक्षिण पार्श्वका आश्रय ले कवच बाँधकर खड़े हुए ॥ ११ ॥
प्रपक्षः शकुनिस्तेषां प्रवरैर्ह्यसादिभिः ।
ययौ गान्धारकैः सार्धं विमलप्रासयोधिभिः ॥ १२ ॥
गान्धार देशके प्रधान-प्रधान घुड़सवारोंके साथ, जो चमकीले प्रासोंद्वारा युद्ध करनेवाले थे, गान्धारराज शकुनि उन दक्षिण पार्श्वके योद्धाओंका प्रपक्ष (सहायक) बनकर चला ॥ १२ ॥
कृपश्च कृतवर्मा च चित्रसेनो विविंशतिः ।
दुःशासनमुखा यत्ताः सव्यं पक्षमपालयन् ॥ १३ ॥
कृपाचार्य, कृतवर्मा, चित्रसेन, विविंशति और दुःशासन आदि वीर योद्धा बड़ी सावधानीके साथ द्रोणाचार्यके वाम पार्श्वकी रक्षा करने लगे ॥ १३ ॥
तेषां प्रपक्षाः काम्बोजाः सुदक्षिणपुरःसराः ।
ययुरश्वैर्महावेगैः शकाश्च यवनैः सह ॥ १४ ॥
उनके सहायक या प्रपक्ष थे सुदक्षिण आदि काम्बोजदेशीय सैनिक। ये सब लोग शकों और यवनोंके साथ महान् वेगशाली घोड़ोंपर सवार हो युद्धके लिये आगे बढ़े ॥ १४ ॥
मद्रास्त्रिगर्ताः साम्बष्ठाः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ।
शिबयः शूरसेनाश्च शूद्राश्च मलदैः सह ॥ १५ ॥